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दुर्गा पूजा, लौह नगरी की!

Posted On: 4 Oct, 2011 Others में

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                                                                                                                                                             आज जब शाम को मैं कुछ फल और सब्जियां खरीद रहा था, दुकानदार, अपनी अपनी दुकानें समेट रहे थे. अभी साढ़े सात बजे थे, दुसरे दिन रात १० बजे तक या फिर साढ़े दस बजे तक दूकान खुला रखने वाले दुकानदार आज साढ़े सात बजे दुकाने समेट रहे थे, साथ ही आपस में बातें कर रहे थे, कितना बजे तक निकलेगा?—- यही कोई दस बजे तक-!
मुझे समझते देर न लगी की ये लोग आज दुर्गा जी की प्रतिमाएं और सुसज्जित पंडाल देखने जायेंगे. आज सप्तमी का दिन था. कल की अपेक्षा आज कम भीड़ होगी इसलिए आज ही भ्रमण – दर्शन के लिए निकलना उचित होगा.
लौह नगरी की यह खासियत है कि यहाँ हर धर्म-संप्रदाय के लोग रहते है और सभी अपने पर्व त्यौहार को अपने अपने ढंग से मनाते हैं. पर दुर्गा पूजा की अपनी अलग पहचान और खासियत है. यह लौह नगरी वस्तुत: औद्योगिक नगरी है यहाँ के अधिकांश लोग छोटे बड़े कारखाने में काम करते है. कारखाने के प्रबंधक दुर्गा पूजा के समय ही अपने कर्मचारियों को बोनस (डबल पगार) देते हैं. यकीनन सभी कर्मचारी उस बोनस के एक अंश को उन लोगों में, जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से बोनस नहीं मिलता है, वितरित कर देते हैं. वितरित करने का तरीका अनूठा कह सकते हैं. — एक तरीका तो सरल है जिसे चंदा, या बक्शीश कह सकते हैं. दूसरा तरीका है ब्यापारी वर्ग का — वे सभी, अपने सामानों का दाम अनूठे तरीके से बढ़ाकर, फिर उसमे छूट देने की घोषणा कर देते हैं; —- लुभावने विज्ञापन देकर, आकर्षक उपहार का झांसा देकर मुनाफा में बृद्धि कर लेते हैं और कर्मचारी वर्ग ‘डबल पगार’ की खुशी में जमकर खरीददारी करते हैं और इस तरह अपने मिले लाभांस का कुछ अंश ब्यापारियों और दुकानदारों को दे डालते हैं. इस प्रकार पूरा शहर, लाभांस पाकर;— दुर्गा पूजा की खुशियाँ, श्रद्धा, पूजा, मिलजुलकर सद्भावनापूर्ण मनाते हैं.
इस का सबसे महत्वपूर्ण विधि है शहर के विभिन्न भागों में जाकर दुर्गा माँ की प्रतिमा एवं भब्य पंडालों का दर्शन व अवलोकन.
सबसे खास बात जो मैं बतलाने जा रहा हूँ वह है पूजा पंडालों का नामकरण यथा, मलखान सिंह का पंडाल, ठाकुर प्यारा सिंह का पंडाल, दुलाल भुइयां का पंडाल, आदि आदि. अब तक आप समझ गए होंगे कि इन पंडालों का नामकरण उस इलाके के बाहुबली के नाम से सुशोभित होता है और इनकी छठा निराली! अत्यंत ही मनोहारी और अपनी आप में विशेष आकर्षण लिए होती है.
मैंने इस साल जितने पंडालों और प्रतिमाओं के दर्शन किये उसमे इस बार एक खासियत नजर आयी, वह यह कि इस बार थर्मोकोल, प्लास्टिक, सिंथेटिक पेंट की जगह, बांस, लकड़ी, जूट, पुआल और मिट्टी की मदद से विशेष हस्तशिल्प की कला का प्रदर्शन किया गया था.
कहीं, ग्रामीण परिवेश का भरपूर चित्रण था. हमारे बच्चे जो गाँव को या तो फिल्मों, या टी. वी. में देखा करते हैं अब उसे प्रत्यक्ष देखकर ज्यादा हर्षित हो रहे थे और कैमरे से तस्वीरें भी खींच रहे थे.
कुछ तस्वीरें मैंने यहाँ लगाई हैं जिसका आनंद आप लोग भी ले सकें.
हर वर्ग के लोग अपनी अपनी हैसियत के अनुसार नए परिधान में सज धज कर निकलते हैं और चार से पाँच दिन त्यौहार का आनंद उठाते हैं. सडकें भीड़ को सम्हालने में अपने आप को अक्षम समझने लगती है. प्रशासन भीड़ को नियंत्रित करने की लगातार कोशिश करता है. दशमी के दिन जब दुर्गा माँ की प्रतिमा का विसर्जन हो जाता है तो शांति का वातावरण लौट आता है. अब लोग खासकर बंगाली समुदाय के लोग विजया मिलन करते हैं. इसका तरीका होता है एक दूसरे के घर जाकर मिलना और मिष्टान्न का सेवन करना या कही एक जगह सभी इकट्ठे होकर भी विजया मिलन का कार्यक्रम करते है, जिसमे सबको सुविधा होती है.
गरबा और डंडिया तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम, जैसे रामलीला, और रावण-दहन का भी आयोजन कुछ प्रमुख स्थानों पर होता है.
मिलाजुला कर सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्परा का यह आयोजन बरसात के अंत और शरद ऋतु के प्रारम्भ में जब रमणीक वातावरण रहता है —- हम सब नई सुबह की कामना से अभिभूत हो जाते हैं.
या देवी सर्वभुतेशु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 4, 2011

आदरणीय जवाहलाल जी सादर अभिवादन ! वैसे तो दुर्गापूजा पुरे देश में मनाई जाती है पर हर प्रदेश की मान्यताएं तौर-तरीके अलग होते हैं | दुर्गापूजा के सम्बन्ध में लौहनगरी के पारंपरिक तरीके की जानकारी देने के लिए साधुवाद |

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 4, 2011

    आदरणीय जवाहरलाल जी, क्षमा करे उपर दी गयी प्रतिक्रिया में आपका नाम गलत टाईप हो गया

    jlsingh के द्वारा
    October 5, 2011

    डॉ. साहब, प्रणाम! आपलोग तो संक्षेप में ही लिखते हैं जिसे प्राय: लोग समझ ही जाते हैं. इस मामूली त्रुटी के लिए माफी मांगने की जरूरत नहीं है. प्रतिक्रिया देने के लिए आभार! -जवाहर.

rajkamal के द्वारा
October 4, 2011

प्रिय जवाहर लाल जी …..नमस्कार ! काश मैं भी इतना कुख्यात (काबिल ) होता की मेरे नाम पर भी एक पंडाल लगता …… लेकिन मुझको पूरा विश्वास है की मेरे आखरी समय के आने के नजदीक मेरे पापों की गठरी कम से कम इतनी बड़ी तो ही ही जायेगी की मेरे नाम से भी एक पंडाल लग ही जाएगा …… आपको लय में आते हुए देखना अच्छा लग रहा है – क्योंकि इस पोस्ट में एक रवानी दिख रही है -ऐसा लगता है की शायद कुछ और जानकारी होती -इसीसे से अंदाजा लगाया जा सकता है की आप पाने प्रयास में कितना सफल रहे है …. आगे भी आपसे इसी प्रकार की लयबद्ध रचनाओ की अपेक्षा है …… जय हो माता जगत जननी जी की :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    गुरुदेव, प्रणाम! बस, उत्साह वर्धन इसीतरह होता रहे. ———- मार्गदर्शन तो आप करते ही रहेंगे.ऐसी अपेक्षा तो रखता ही हूँ. आपके नाम यह (जागरण) मंच तो है ही सर! देखिये न कितने शिष्य बना लिए है आप, और आपकी छत्रछाया हमलोगों के लिए पंडाल से कम है क्या? साभार– जवाहर.

rajkamal के द्वारा
October 4, 2011

प्रिय जवाहर लाल जी …..नमस्कार ! काश मैं भी इतना कुख्यात (काबिल ) होता की मेरे नाम पर भी एक पंडाल लगता …… लेकिन मुझको पूरा विश्वास है की मेरे आखरी समय के आने के नजदीक मेरे पापों की गठरी कम से कम इतनी बड़ी तो ही ही जायेगी की मेरे नाम से भी एक पंडाल लग ही जाएगा …… आपको लय में आते हुए देखना अच्छा लग रहा है – क्योंकि इस पोस्ट में एक रवानी दिख रही है -ऐसा लगता है की शायद कुछ और जानकारी होती -इसीसे से अंदाजा लगाया जा सकता है की आप पाने प्रयास में कितना सफल रहे है …. आगे भी आपसे इसी प्रकार की लयबद्ध रचनाओ की अपेक्षा है …… जय हो माता जगत जननी जी की :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/ http://profile.ak.fbcdn.net/hprofile-ak-snc4/275754_100002519395207_752451451_n.jpg

vasudev tripathi के द्वारा
October 4, 2011

आदरणीय सिंह साहब, दुर्गापूजा संपूर्ण भारत का पर्व है जिसे प्रत्येक स्थान पर अपनी श्रद्धा भाव से मनाते हैं। यह हिंदुओं का शक्ति पूजन का पर्व है जिसके बाद हम विजय पर्व मनाते हैं। आज भारत का युवा शक्ति व शक्तिपूजन के उद्देश्यों को समझे यही कामना है। लौहनगरी के पारंपरिक तरीके की झलक दिलाने के लिए हार्दिक आभार॥

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    वासुदेव जी, नमस्कार! नि:संदेह दुर्गा पूजा सम्पूर्ण भारत का पर्व है. मैंने लौह नगरी की कुछ झलकियाँ बताने की कोशिश की है. उम्मीद है दुर्गा माता सभी भारतीयों में अपनी ‘शक्ति’ का संचार कर दें ताकि हम अपने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे सकें! युवा शक्ति का आह्वान अन्ना साहब भी कर रहे हैं. बारात का युवा अगर जाग जाये तो भारत माता की तस्वीर बदल जायेगी! टिप्पणी के लिए आभार! -जवाहर.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 4, 2011

जे एल सिंह जी, सौभाग्य से आपकी लौहनगरी का मैं भी कुछ वर्षों तक हिस्सा बना रहा हूं, इसलिये आप द्वारा उल्लेखित सभी पन्डालों को खूब देखा समझा है । सचमुच आपकी लौह नगरी की दुर्गापूजा सराहनीय होती है । हो भी क्यों नहीं, जहां टाटा समूह अधिकतम 1,30,000=00 (एक लाख तीस हज़ार रुपए) का बोनस अपने एक कर्मचारी को बांटता हो, उस बाज़ार की खुशहाली का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है । विशेष कर रमेश बाजपेयी सर के इलाक़े का मलखान सिंह पंडाल मुझे हर वर्ष अभिभूत करता था । धन्यवाद !

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    शाही साहब, नमस्कार! आप तो सब जानते है! मलखान सिंह का पंडाल और ठाकुर प्यारा सिंह का पंडाल, दोनों अपने आप में हर साल अनूठा सन्देश लेकर आता है. भीड़ जो है कि सम्हाले नहीं सम्हलती. इस साल मलखान सिंह का अक्षर धाम की अनुकृति प्रशंसनीय है. वहां इस बार गणेश भगवान् अन्ना टोपी पहने सबको सुविचार बाँट रहे हैं. रही बात टाटा समूह की तो यह भी आप अच्छी तरह जानते हैं कि टाटा समूह अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को कितना महत्व देती है! आज पूरे शहर की(टाटा द्वारा ब्यवस्थित क्षेत्र) की विद्युत्,पानी और सड़क ब्यवस्था सराहनीय है. आपको विजय दशमी की शुभकामना! -जवाहर.

sadhana thakur के द्वारा
October 4, 2011

jlsingh ji ,आपके इस सजीव वर्णन से मुझे अपने वहां बिताये मधुर पल याद आ गए ..आज अपनों से दूर बहुत याद आती है अपनों की …अच्छा आलेख लिखा आपने …….

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    साधना जी, नमस्कार! आपको अपनों की, और अपनों के साथ बिताये पल याद आयी, यह तो बड़ी खुशी की बात है. पर्व त्यौहार होते ही ऐसे है जिसे अपनों के साथ मनाने में भी विशेष सुखानुभूति होती है. पर किसी ख़ास परिस्थिति वश हम अपनों से दूर हो जाते है! पर आज के माहौल में भौतिक दूरियां, रिश्तों में प्रेम की गहराई को कम नहीं कर सकता है! आपको विजय दशमी के ढेरों शुभकामना! – जवाहर.

akraktale के द्वारा
October 4, 2011

जवाहर जी नमस्कार, बहुत सुन्दर चित्रण किया है आपने अपने शहर के नवरात्री पर्व का.आपने बोनस और उसके बंटवारे का अच्छा जिक्र किया है और भाई साहब पंडाल का नाम ही चन्दा मिलने में सहायक होता है वरना तो इतने बड़े पंडाल शायद ही लग पायें. मेरी बात को अन्यथा न लें मगर सत्य यही है.माँ दुर्गा सबका कल्याण करे. बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    अशोक जी, नमस्कार! आपने सही समझा है, मेरा इशारा उसी तरफ था,— भीड़ भी ज्यादा उन्हीं पंडालों में होती है और आम आदमी को कुछ परेशनियों का भी सामना करना पड़ता है क्योंकि उस खेत्र से गुजरने वाली सड़क जाम हो जाती है.— खैर, दुर्गा माता क्षमा करें! आपको विजय दशमी की हार्दिक शुभकामना!

suman dubey के द्वारा
October 4, 2011

जवाहर जी नमस्कार ,आपने तो सहज ही लौह नगरी के दुर्गा पूजा का अवलोकन करा दिया आपको भी दुर्गा पूजा व् विजयदशमी की शुभकामनाये .जयहिंद .

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    सुमन जी, नमस्कार! आपको भी विजय दशमी और दशहरा की ढेर सारी शुभकामना! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

alkargupta1 के द्वारा
October 4, 2011

जवाहर जी ,हर्सोल्लास से मनाये जाने वाले त्योहारों व उत्सवों की रमणीकता देखते ही बनती है….हृदय में द्वुगणित आनंदानुभूति होती है…….अति उत्तम प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    अलका जी, नमस्कार! विजय दशमी की हार्दिक शुभकामना! सराहना के लिए धन्यवाद!

abodhbaalak के द्वारा
October 4, 2011

जवाहर जी बंगाल से लगे होने के कारण अब झारखण्ड और बिहार में भी दुर्गा पूजा बड़े ही भव्य तरीके से मनाई जाने लगी है, और मुझे भी ऐसे ही दर्शनीय पंडाल देखने को मिले थे जब मई ….. दुर्गा पूजा के अवसर पर एक सुन्दर पोस्ट….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    अबोध जी, आप तो भली भांति परिचित हैं यहाँ के पूजा से! इस कमर तोड़ महंगाई में भी हमारे उल्लास को कम नहीं किया है, जहाँ खर्च को घटा सकते हैं वहां घटाकर हमने त्योहारों को भी सहजता और कम खर्च में मनाना सीख लिया है. मैं समझता हूँ, कम खर्च में उपलब्ध सामग्री को इस्तेमाल कर, गरीब ग्रामीण लोगों को भी रोजगार दिलाने में इस साल की दुर्गा पूजा काफी सहायक रही है!

Santosh Kumar के द्वारा
October 4, 2011

आदरणीय जवाहर जी ,.सादर अभिवादन बहुत सहज भाव से आपने शहर में दुर्गा पूजा के कई पहलुओं को हमसे साझा किया,….यह नव उल्लास सदैव हमारे जीवन में बना रहे ,…हार्दिक शुभकामनाये

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    संतोष जी, विजय दशमी की हार्दिक शुभकामना! त्यौहार उल्लास का प्रतीक है और हम सारे गम भूल कर त्यौहार की खुशी को साझा करते है! बहुत बधाई आपको भी!

Ramesh Bajpai के द्वारा
October 4, 2011

सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्परा का यह आयोजन बरसात के अंत और शरद ऋतु के प्रारम्भ में जब रमणीक वातावरण रहता है —- हम सब नई सुबह की कामना से अभिभूत हो जाते हैं. प्रिय श्री जवाहर जी यह सहज माधुर्य भला और कंहा | उदारता से विभिन्नता को समेटे यह शहर बहुत ही जिन्दादिली से त्योहारों, के आनन्द को लुटाता है | शुभ कामनाओ सहित

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2011

    बाजपेयी साहब, नमस्कार! आपको भी विजय दशमी की हार्दिक शुभकामना! हमारे देश की यही खासियत है किहम सभी त्यौहार उमंग और उल्लास के साथ मनाते है! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!


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