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ये रिश्ते---!

Posted On: 9 Oct, 2011 Others में

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“ईश्वर अंश जीव अविनाशी!”– अर्थात यह ‘जीव’ ईश्वर का अंश और अनश्वर है.
यही ईश्वर अंश जब शरीर धारण कर पृथ्वी पर अवतरित होता है, वही से रिश्ते की शुरुआत हो जाती है –
सबसे पहले माता पिता और उनके द्वारा बताये गए अन्य रिश्तेदार. बच्चा धीरे धीरे बड़ा होता है और अन्य रिश्तों में बंधता जाता है. मित्र, मित्र के मित्र, प्रेमिका, पत्नी और उनसे सम्बन्धित लोग. रिश्तों की लम्बाई चौड़ाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जाती है और नए रिश्तों के बनने से पुराने या यों कहें की सबसे पुराने रिश्ते जो माँ-बाप के थे, धीरे धीरे क्षीण होती जाती है और एक समय तो ऐसा आता है कि यह सब से पुराना रिश्ता ‘भार’ सा लगने लगता है. अगर कही से अचानक दबाव पड़ा नहीं कि — टूट गया!
यह सब किसी एक परिवार या घर की कहानी नहीं है प्राय: अधिकांश घरों की यही हालत है. (कुछ अपवाद ‘आदर्श परिवार’ को छोड़कर)
अभी हाल की सच्ची घटना को देखकर मेरे मन में इस तरह के ख्याल आने शुरू हुए हैं.
मेरे एक मित्र के माता-पिता अवकाश प्राप्ति के बाद काफी दिनों तक अपने परिवार से अलग रह रहे थे. उनके तीन पुत्र और चार बेटियां सभी अपने अपने क्षेत्र में मिहनत करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. तेज रफ़्तार जिन्दगी में किसी को यह परवाह न रही कि उनके माता पिता किन दिक्कतों का सामना करते हुए अकेले रहने को मजबूर है. ऊपर से इन्ही बुजुर्ग का पोता उनके पी. एफ. के रुपये को यह कहकर ले गया कि ‘मंथली इनकम स्कीम’ से ज्यादा लाभ देगा और शेयर में लगाकर खूब कमाया, जो लाभ हुआ वह उसका हुआ और जब नुकसान हुआ तो दादा का!
अब तो इस बुजुर्ग दंपत्ति के पास ज्यादा पैसे भी न रहे — तो भला कोई क्यों झंझट मोल ले. —- सबने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. हालत यह हो गयी कि ये दोनों बुजुर्ग दंपत्ति अपने हाल पर एक दुसरे के आंसू पोंछते हुए दिन गुजार रहे थे. फिर एक दिन ऐसा आया कि बेचारे ‘बाबूजी’ बीमार पड़े और कई दिन तक अपने हाल पर पड़े रहे. एक दिन एक पड़ोसी ने इनकी दयनीय अवस्था देखकर उनके घर पर फ़ोन किया. इस हालत में भी उनका सबसे नालायक बेटा (पढ़ा लिखा बेरोजगार) बेटा ही ‘कपूत पोते’ और एक चचेरे भाई के साथ उनको देखने और लेने आया. मुझे भी खबर मिली तो मैं भी उन्हें देखने के लिए मोसम्मी(फल) लेकर पहुंचा. मुझे देखकर सभी खुश हुए और उसी मोसम्मी को चूसने के लिए ‘बाबूजी’ को दिया गया. —–
आज मांजी को लेकर उनका पोता और चाचा का लड़का गाँव जानेवाला था. बाबूजी आज नहीं जा रहे थे क्योंकि उनके पैथोलोजिकल टेस्ट का कुछ रिपोर्ट आने बाकी थे. रिपोर्ट नोर्मल होने के बाद दुसरे दिन वे अपने नालायक बेटे के साथ जानेवाले थे. आज दोनों बुजुर्ग दंपत्ति के लिए वियोग का दिन था! पूरा का पूरा बागवां की कहानी दृष्टिगोचर हो रही थी! — बाबूजी ने अपने पोते से कहा – देखना रस्ते में बाथरूम वगैरह के लिए पूछते रहना और सुविधानुसार करा देना. पानी भी साथ रख लो और ग्लास भी — वह बोतल से पानी नहीं पी सकेगी. यह लो कुछ मोसम्मी दादी के लिए भी रख लो रास्ते में खिला देना.
मेरा मन मसोस रहा था उस करुण दृश्य को देख कर! — (पता नहीं हमलोगों के साथ इस तरह की घटना कब घटेगी.)
गाड़ी में दादी के साथ पोता बैठने को तैयार नहीं हुआ — “रास्ते भर ‘फजूल’ की बातों से परेशान करती रहेगी!” अंत में चाचा जी का लड़का अपनी बड़ी माँ के साथ बैठा. जहाँ तक मुझे पता था उसी लड़के और उसके बाप को मांजी जिन्दगी भर कोसते हुए नहीं थकती थी……. और अपना पोता तो सबसे प्यारा था, आज वह भले ही कपूत हो गया था.
दुसरे दिन नालायक बेटे के साथ बाबूजी भी गाँव चले गए और भरे पूरे परिवार में जा मिले.
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लगभग महीने भर बाद मेरे मित्र से मेरी बात हुई और मैंने माँ – पिताजी का हाल पूछा — पता चला शारीरिक तकलीफ तो कम हो गयी है पर मानसिक तकलीफ बढ़ गयी है. कोई भी पास में बैठकर दो मीठी बात भी नहीं करता. दोनों माँ-बाबूजी आपस में ही अपने हाल पर रोते रहते हैं. देखिये कब तक जीवित रहते हैं………………?
इस घटना को हूबहू लिखने का मेरा मकसद यही है कि आज हमलोगों को क्या हो गया है; जो माँ बाप अपने बेटे पोते को पालने पोसने और लायक बनाने में अपनी सभी सुविधाओं का गला घोंट देता है वही संतान अपनी माता पिता के साथ दो मीठे बोल भी नहीं बोल पाता है. भले ही अपने बॉस के साथ सत्संग करते हुए या उनका प्रवचन सुनने में जरा भी कष्ट नहीं होता है. क्योंकि वहां पर तरक्की रूपी स्वार्थ दीखता है. जहाँ से सारा स्वार्थ सिद्ध हो चुका है, वहां प्रवचन सुनने से क्या लाभ!
यही सब लगभग आनेवाली पीढी के साथ होने वाला है.
अंत में फिर गोस्वामी जी की उक्ति याद आती है, — “सुर नर मुनि सबकी यह रीति, स्वारथ लागी करहीं सब प्रीती.”

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
October 12, 2011

आपकी संवेदनशीलता का परिचायक आपका ये आलेख भौतिकता की चकाचोंध में लिप्त मानवों को कुछ शिक्षा दे सके.

    jlsingh के द्वारा
    October 14, 2011

    निशा जी, नमस्कार! कोशिश तो यही होनी चाहिए की प्रबुद्ध वर्ग अपनी सामाजिक उत्तरदायित्त्व से दूर न भागे. पर हो रहा उल्टा है, तथाकथित पढ़े लिखे घरानों में ही माँ बाप उपेक्षित महसूस कर रहे है. शुभकामना और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद..

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 10, 2011

जवाहर जी, अत्यंत ही मार्मिक वृत्तान्त। भौतिकता की अंधी दौड़ में आज मानवीय मूल्य लुप्त हो चुके हैं। संवेदना के तेल के अभाव में रिश्तों-नातों और संबंधों की घूमती धुरी अब चरमरा गई है। हम सब के आसपास ऐसी घटनाएँ रोज़ घट रही हैं और हम मूक दर्शक बने देख रहे हैं। आपका यह वर्णन एक मानव के रूप में आपके संवेदनशील हृदय की पहचान है। आभार,

    jlsingh के द्वारा
    October 10, 2011

    वाहिद साहब, नमस्कार! आप सभी अग्रज हमारी प्रेरणा श्रोत है. घटनाएँ तो रोज घटती है, पर कुछ ऐसी जो दिल पर अघात कर दे तो हम सोंचने और एक दुसरे के साथ बाँटने को मजबूर हो जाते है. आपने मेरी संवेदनशीलता को पहचाना यह आपका बड़प्पन है! बहुत बहुत धन्यवाद!

sumandubey के द्वारा
October 9, 2011

जवाहर जी नमस्कार , समाज की सच्चाई वय़ा करता आपका आलेख जय हिंद .

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    सुमन जी, नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार!

sadhana thakur के द्वारा
October 9, 2011

सच कहा आपने यही जीवन की सच्चाई हैं ,कल सबके साथ यही होना है पर लोग भूल जाते हैं …………..

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    साधना जी, नमस्कार! आपकी रचना – ‘रचनाकार —- ये क्या रचा तूने?’ भी काफी ह्रदय विदारक है. हम सबको कहीं न कहीं इन सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ता है. काश, ये न होता! पर ईश्वर भी अजीब है, हम सबको सत्य का दर्शन करा कर ही छोड़ता है. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

abodhbaalak के द्वारा
October 9, 2011

जवाहर जी मार्मिक रचना, जो दिल को कहीं न कहीं कचोट …………. काश हम ये जानते की जो हम बो रहे हैं हैं वो …………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    अबोध जी, नमस्कार! आप के बहुत सारे लेख मार्मिक और हृदयस्पर्शी होते हैं. यह तो एक सत्य कथा है जिसके अन्दर अपनत्व का बोध होता है और इस बोध से मन कांप उठता है. काश–! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

bharodiya के द्वारा
October 9, 2011

सिंगभाई डुबते हुए सुरज की व्यथा की कथा आपने बहुत अच्छी तरह बताई । लेकिन सच में ऐसी कथा किसी को अच्छी नही लगती, डर रेहता है की कहीं ये हमारे खूद के भविष्य की कथा तो नही ।

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    भरोदिया साहब, नमस्कार! आपने सच्चाई को और भी ज्यादा अनावृत करने की कोशिश की है. आशा है हम सब का भविष्य इस तरह के कटु सत्य से वंचित रहे यही कामना के साथ! आपको बहुत बहुत धन्यवाद!

akraktale के द्वारा
October 9, 2011

जवाहर जी नमस्कार, बहुत ही व्यावहारिक घटना है दिल को गहरे तक छू जाती है. मनुष्य जीवन तो उस पौधे के सामान है जिसे हम रोपते हैं नित्य प्रति उसको पानी देते हैं कहीं मुरझा न जाए फिर बड़ा होने पर हम उसका कम ध्यान रखते हैं किन्तु अब उससे छाया की उम्मीद करते हैं.और पुराना होने पर जब उसमे अब फल भी कम छांह भी कम होने लगती है तो कुछ दिन तो हम उसको बचने के लिए जी तोड़ कोशिश करते हैं फिर बात जोहते हैं की कब ये सुख जाए.यही क्रम हमें प्रकृति ने समझाया है कुछ लोग मगर सब्र की कमी में कुछ चरण आगे निकल जाते हैं वाकई वह दुखद है. आपने बहुत ही सुन्दरता के साथ सत्य घटना प्रेरणा के लिए दी है अवश्य की यह प्रेरनादायी हो .

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    अशोक जी, नमस्कार! बहुत ही सुन्दर विश्लेष्णात्मक प्रतिक्रिया दी है आपने और बहुत सुन्दर दृष्टान्त देकर समझाया है. मेरे द्वारा प्रस्तुत सत्य कथा हम सभी के लिए प्रेरणादायी है. हम सभी आये दिन इस प्रकार के अनुभवों से रूबरू होते हैं, पर समझते तब हैं जब काफी देर हो चुकी होती है. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
October 9, 2011

जवाहर लाल जी व्यवहारिक उदाहरण के साथ अच्छे शब्दों में लिखा है आपने.

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    निशा दीदी, नमस्कार! यह रचना, आपकी पोस्ट ‘बच्चों को मोहरा न बनायें’ से अनुप्रेरित है. आपका लेख जिसमे ब्यापक दृष्टिकोण है, को पढ़ने के बाद ही मेरे मन में इस सच्ची घटना को लिखने का साहस हुआ. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

Abdul Rashid के द्वारा
October 9, 2011

आदरणीय जवाहर जी नमस्कार जिंदगी को जिंदगी से मिलाने के लिए बधाई http://singrauli.jagranjunction.com

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    रशीद भाई, आदाब! बहुत बहुत मेहरबानी आपकी, जो आपने इसे सकारात्मक रूप में लिया है. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया!

rajkamal के द्वारा
October 9, 2011

:) :( ;) :o 8-) :| प्रिय जवाहर लाल जी ……सादर अभिवादन ! यह कैसी बाड़ तैयार हो रही है जोकि आत्मनिर्भर होकर खेत को ही निगलने में एक पट का समय भी नहीं है गंवाती ….. आपके लेख की सबसे महत्वपूर्ण और मार्मिक लाइन मुझको यह लगी :- मेरा मन मसोस रहा था उस करुण दृश्य को देख कर! — (पता नहीं हमलोगों के साथ इस तरह की घटना कब घटेगी.) जैसी करनी वैसी भरनी –भले ही हम आज के युवा इस बात को भूल चुके है लेकिन समय का पहिया जब घूमी -२ कर के पलटेगा तब पछतावे के सिवा कुछ भी हाथ नहीं होगा ….. इस बेहतरीन रचना पर मेरी तरफ से भी मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    गुरुदेव, सादर प्रणाम! आपने लेख को गहराई से समझा है. मेरा आशय यही है कि हमलोग भौतिक सुखों के पीछे अपनी सारी जिन्दगी लगा देते है, पर अपने बुजुर्गों के प्रति हमारा जो कर्तव्य है, वह कही पीछे छूट जाता है. हम सब के लिए और नयी पीढ़ी के लिए यह विचारणीय है. हम जो बोयेंगे वही तो काटेंगे!

Santosh Kumar के द्वारा
October 9, 2011

आदरणीय जवाहरलाल जी ,.सादर प्रणाम अत्यंत सार्थक पोस्ट ,…लोंगो को सोचना चाहिए कि वो जिन बच्चों के सुखद भविष्य के लिए अपने माँ-बाप को भी कष्ट देते हैं ,…किसी दिन वो आपकी जगह होंगे और आप माँ -बाप की जगह,.. इंसान अपना भविष्य खुद ही खराब कर लेता है ,..ईश्वर के लिए कुछ छोड़ता ही नहीं ,..जब साक्षात इश्वर को खुश नहीं कर सकता तो फिर ……….. तुलसीदास जी ने यह भी लिखा है ,…सकल पदारथ हैं जग मांही – कर्महीन नर पावत नाही बहुत ही जागरूक करने वाली पोस्ट ,…आपका हार्दिक अभिनन्दन

    jlsingh के द्वारा
    October 9, 2011

    संतोष जी, नमस्कार! सार्थक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. वस्तुत: यह एक सच्ची घटना है, पर आज के समाज में यह क्रूरतम दृश्य काफी जगह थोड़े अलग अलग जगहों में देखने को मिल जाता है. हाँ, आपके परामर्श के अनुसार हर इंसान को ईश्वर के लिए थोड़ा समय जरूर निकालना चाहिए जिससे अपना मन शुद्ध हो और अच्छे विचार मन में पैदा हो!


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