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मेरे बाबूजी की लघुकथा !

Posted On: 15 Jun, 2012 Others में

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fathers-day[1]

दूर जब किसी बच्चे के रोने की आवाज भी सुनाई पड़ती थी.. लगता था, उन्ही का बच्चा रो रहा है और वे तुरंत पहुँच जाते थे यह जानने के लिए कि वह बच्चा क्यों रो रहा है .. अगर उसको कोई मार रहा है, तो मारनेवाला समझ ले कि उसका हाथ रोकने वाला आ गया है और अब उसे डांट पड़ने वाली है. अगर बच्चा किसी चीज के लिए रो रहा है, तो संभवत: उसे गोद में लेकर चुप कराया जायेगा और एक दो लेमनचूस देकर उसकी रुलाई को शांत किया जायेगा … ऐसे थे मेरे बाबूजी… मेरे गाँव में जल्दी किसी को यह हिम्मत ही नहीं होती थी कि वह अपने बच्चे को भी मेरे बाबूजी के सामने मार सके या ज्यादा डांट सके …
मैं ज्यादातर अपनी माँ के सामने किसी चीज के लिए जिद्द करता था और माँ मुझे तबतक डांटती या दूर भागने का प्रयास करती थी जबतक कि मेरे बाबूजी आसपास न हों, उनके आते ही मेरी इच्छाएं पूरी कर दी जाती थी.
बचपन में मैं दूध दही से दूर भागता था…. आलू की सब्जी छोड़ किसी और सब्जी खाने की इच्छा ही नहीं होती थी … यह बात घर में किसी को पसंद नहीं थी … मेरे पिताजी को भी नहीं … कहते हैं कि (मुझे होश में आने का बाद बतलाया गया) … मेरे पिताजी ने दुखी होकर एक ही दिन गाय, भैस और उनके बच्चे को बेच दिया अपने कलेजे पर पत्थर रखकर….. ( उनका कहना था कि जब मेरा बेटा ही दूध दही नहीं खाता है तो इन गाय, भैसों को रखने का फायदा ही क्या?) .. जबकि उन्हें दूध दही और घी आदि खूब पसंद थे .. उस समय शाकाहारी ब्यक्ति की समाज में इज्जत थी और मांसाहारी को हेय दृष्टिकोण से देखा जाता था…. माँ से बर्दाश्त नहीं हुआ और दूसरे घर से दूध खरीद कर लाने लगी, जिसमे से बाबूजी के साथ सबको थोड़ा थोड़ा मिलने लगा.
मेरे पिताजी जन्मजात किसान थे और मजदूरों के साथ खुद भी खेतों में खूब मिहनत करते थे और अच्छी फसलें देखकर खुश होते थे. वे स्वयम ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर उनके मन में यह इच्छा जरूर थी कि अपने बच्चे को पढावें और उन्होंने मेरे बड़े भ्राता को पटना के बी. एन. कॉलेज से बी. एससी. पास करवाया तो उनका नाम आस-पास के गाँव में भी हुआ, उस समय मैट्रिक पास करना भी मेरे पिछड़े गाँव के लिए असामान्य सी बात थी. पटना मेरे गाँव से था तो मात्र २५ कि मी दूर, पर आवागमन का साधन बिलकुल नहीं के बराबर था ६ कि मी पैदल, फिर ट्रेन और उसके बाद भी पटना जंक्सन स्टेसन से पैदल ही कॉलेज तक जाते थे मेरे बड़े भ्राता. छुट्टियों के दिनों में वे खेत घर के कामों में भी मन लगाकर भाग लेते थे.
मेरे पिताजी शुबह चार बजे तो जग ही जाते थे और सभी खेतों में घूमकर ६-७ बजे तक वापस घर आ जाते थे. तबतक शायद मैं सोया ही रहता था. पिताजी डाँटते नहीं थे पर देर तक सोना उन्हें पसंद नहीं था, इसलिए दीदी मुझे चुपके से जगा देती थी और मैं पिताजी की नजरें बचाकर बाहर निकल जाता था.
हलका जलपान लेकर या शरबत पीकर भी वे खेतों में चले जाते थे. कभी हल बैलों के साथ तो कभी मजदूरों के साथ ..
मैं दोपहर को उनलोगों के लिए यदा-कदा खाना-पानी लेकर जाता था … वे खुश होते थे और हाथ मुंह धोकर वही जलपान करने लग जाते. मैं कौतूहल वश कभी हल चलाने की कोशिश करता या कुदाल पकड़ता तो वे प्यार से मना करते… थोड़ा और बड़ा हो जा, फिर खेत का काम सम्हालना !
मेरे बाबूजी बहुत ही नियमित जीवन ब्यतीत करते थे .. प्रकृति के आस-पास ही रहते थे, इसलिए उन्हें जल्दी कोई बीमारी भी नहीं होती थी, दिनभर खेतों में काम करने के बावजूद, शाम को रामायण लेकर दालान में बैठ जाते थे और लालटेन की रोशनी में रामायण पढ़कर लोगों को सुनाते और समझाते थे…. मेरे गाँव के बहुत सारे लोग मेरे बाबूजी को श्रद्धा की नजरों से देखते थे. वे एक गृहस्थ होते हुए सदाचार का भरपूर पालन करते थे. हर पूर्णमासी या विशेष पर्व त्यौहार के दिन पटना जाकर गंगा-स्नान करना और वहां से कुछ मिठाई आदि लेकर ही घर लौटना, उनकी दिनचर्या में शामिल था. ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जिस दिन वे बिना नहाये और पूजा किये खाना खाए होंगे! यह नियम उनका तबतक चलता रहा, जबतक कि वे लाचार होकर बिस्तराधीन नहीं हो गये. उनके अंतिम क्षणों में मैं और मेरे भैया, दोनों ने यथासंभव सेवा की .. मैं समझता हूँ आज भी उनका आशीर्वाद हम सबके साथ है - उनका ब्रहम वाक्य – “बेटा हो सके तो किसी का भला कर दो, पर किसी का बुरा चाहना भी मत!”
उनके उदगार में कुछ पक्तियां
कोई बच्चा जब रोता हो
उसका बापू ही धोता हो
तब खैर नहीं होगी उसकी
खायेगा चाचा की फटकी(फटकार)
बच्चे को गोद उठाकर के
उसे लेमनचूस खिला कर के
बाबूजी तब खुश होते थे
कंधे पर उसको ढोते थे.
मैं हूँ किसान का वह बेटा
देखी है मैंने उनकी ब्यथा
गर्मी में लू जब चलती थी
धरती प्यारी जब जलती थी
बाबूजी तब खुश होते थे
वे खलिहानों में होते थे
बारिश हो या आंधी-पानी
खेतों में जमता था पानी
बाबूजी तब खुश होते थे
खेतों में हल को जोते थे.
सर्दी उनको न सताती थी
सरसों उनको बहलाती थी
जब सर्द हवा उनको लगती
आत्मा तभी उनकी जुड़ती
बाबू जी तब खुश होते थे
खेतों में ही वे सोते थे!
पेड़ों के नीचे डाल खाट
लेते चना मटर की स्वाद
चाचा जी, हरा चना दे दो
अपनी मर्जी से खुद ले लो
बाबूजी तब खुश होते थे
बच्चे जवान संग होते थे.
गेहूं की बाली लहराती
सरसों की फलियाँ बलखाती
आलू के संग हरी भाजी
धनिया पालक सह मेथी भी
बाबूजी तब खुश होते थे
गाजर मूली को धोते थे !
होली में रंग लगाते थे
फगुआ भी संग में गाते थे
बहुएँ घूंघट में आती थी
चरणों में रंग चढ़ाती थी
बाबूजी तब खुश होते थे
पोते को गोद में लेते थे.

प्रभु तुम मुझको इतना देना
भूखा न रहे मेरा ललना
आ जाये अगर कोई मेहमान
सेवा कर हो जाऊं निहाल
नहीं होना चाहूं धनवान
बच्चे बन जाये बुद्धिमान
बाबूजी तब खुश होते थे
हम कक्षा में अव्वल होते थे.
ये है बापू की छोटी कथा
मैं हूँ उनका ही वह बेटा!
मैं हूँ उनका ही वह बेटा!….

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66 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीय सिंह साहब ! पितृ दिवस के अवसर पर सन २०१२मे आपने यह लेख अपने पिताजी की याद में लिखा था ! आज हमें भी पढ़ने का सुअवसर मिला ! बहुत भावपूर्ण और संवेदनशील आलेख और कविता ! मुझे अपने नाना जी की याद आ गई ! पूरी तरह से शुद्ध शाकाहारी और प्रतिदिन शाम को घर आये एक दो साधुओं की पूरे समर्पण भाव से सेवा करने वाले मेरे नाना जी बिलकुल ऐसे ही थे ! मैं खेलनेमे ज्यादा व्यस्त रहता था ! कभी कभार खाना दे के किसी ने खेत पर भेज दिया तो उन तक खेलते कूदते पहुँचने में चाहे कितनी भी देरी हुईं हो वो हमेशा हँसते रहते थे ! बहुत शांतिपूर्ण और खुशहाल जीवन उनका था .. न कोई लोभ लालच और न ही रूपये बटोरने के लिए कोई हाय हाय कीच कीच.. ! बहुत संतोषी जीवन था ! ब्लॉग दिल के करीब और बहुत अच्छा लगा ! आपसे आग्रह है कि इसे एक बार पुनः प्रकाशित कीजिये ! सादर आभार !

    jlsingh के द्वारा
    July 26, 2016

    आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! जो बात सच्ची होती है और सामान सी लगती है वह दिल के करीब होती ही है. आपने देर से ही सही मेरे इस आलेख को पढ़ा और अपने भी उदगार व्यक्त किये, बहुत अच्छा लगा. आपका बहुत बहुत आभार! अगली बार जब पितृदिवस आएगा तब पूण: इसे प्रकाशित करने की कोशिश करूंगा. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
March 21, 2016

‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाए, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए’ । यही भाव आपके इस लेख में समाहित इस कविता की इन पंक्तियों में भी है : ‘प्रभु तुम मुझको इतना देना, भूखा न रहे मेरा ललना, आ जाए अगर कोई मेहमान, सेवा कर हो जाऊं निहाल’ । मैं आभारी हूँ जवाहर जी आपका कि आपने मुझे इस अनमोल ब्लॉग का लिंक दिया । अपने बाबूजी की स्मृतियों से ओतप्रोत आपका यह संस्मरण और इसका अभिन्न अंग यह कविता दोनों ही मुझ जैसे व्यक्ति के नेत्र नम कर देने वाली रचनाएं हैं । धन्य हैं आप जो ऐसे महान पिता आपको मिले । आपको जो सुसंस्कार उनसे मिले हैं, वे ही आपकी लेखनी में मसी बनकर उतरते हैं ।

    jlsingh के द्वारा
    March 21, 2016

    बहुत बहुत आभार आदरणीय जितेन्द्र माथुर जी, आपने अपने पिता जी के बारे में बताया तभी मैंने आपको अपने करीब पाया और सोचा कि मैं आपको अपने बारे में अवश्य बतलाऊँ … हार्दिक आभार इस ब्लॉग तक आकर अपने विचार प्रकट करने के लिए.

harirawat के द्वारा
June 15, 2013

जवाहरलाल जी आज पूरे एक साल हो चुका है आपके द्वारा लिखा यह अविस्मणीय लेख, अपने पिता को सच्चे मन से दी गयी यह यादों की भेंट ! और मैं आज आ पाया हूँ इस स्थल पर जहाँ माँ पिता जी पूजे जाते हैं, पिता जी को सच्ची श्रद्धा भक्ती से यादों के कुसुम चढ़ाए जाते हैं ! दिल को अन्दर तक स्पर्श करने वाला लेख के साथ सरिता रूपी कविता, जिसमें करूणा भी है, वातसल्य भी है, स्नेह से सराबोर है, सर्वगुण सम्पन इस सुन्दर कृति के लिए “मेरे बाबूजी की लघु कथा” के लिए आप बधाई के पात्र हैं ! आशीर्वाद के साथ शुभ कामनाएं ! हरेन्द्र

    jlsingh के द्वारा
    March 21, 2016

    बहुत बहुत आभार चाचा जी, मैंने आपमें अप ने पिता जी के नाम की साम्यता के अलावा आपका मेरे प्रति प्यार भी हम दोनों को नजदीक लाया है. मैंने भी आपके संघर्ष की कथा पढ़ी थी तभी मेरे मन में आपके प्रति श्रद्धा भाव जाग्रत हुआ था. सादर प्रणाम!

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
June 25, 2012

जवाहर जी, आपने पिता को समर्पित इस रचना में आपने अपने दिल की बात को रखकर भावुक किया.अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को एक योग्य नागरिक बनाने के लिए बहुत त्याग करते हैं.यही त्याग बच्चों के जीवन का मार्गदर्शक होता है.

    jlsingh के द्वारा
    June 25, 2012

    आदरणीय राय साहब, सादर अभिवादन! आपका हार्दिक आभार!

alkargupta1 के द्वारा
June 22, 2012

सिंह साहब, पिताजी के व्यक्तित्त्व के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा….. उनकी याद में लिखी गयी काव्य पंक्तियों में उनके पूर्ण व्यक्तित्त्व को बहुत ही सुन्दर रूप में व्यक्त किया है उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए मेरा नमन

    jlsingh के द्वारा
    June 22, 2012

    अलका जी, नमस्कार! आपने मेरे पिताजी के व्यक्तित्व को पसंद किया, इसके लिए आपका ह्रदय से आभार!

rekhafbd के द्वारा
June 22, 2012

जवाहर जी ,अपने पिता को समर्पित आपकी भावनाओं को मेरा नमन ,आभार

    jlsingh के द्वारा
    June 22, 2012

    रेखा जी, नमस्कार! आपका बहुत बहुत आभार!

yogi sarswat के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय जवाहर जी,सादर नमस्कार ! अपने पिता की स्मृति को बखूबी शब्दों में ढाला है., एक तरह से पिता के कर्त्तव्य दिखा दिए हैं आपने ! प्रभु देना तुम मुझको इतना भूखा न रहे मेरा ललना आ जाये अगर कोई मेहमान सेवा कर हो जाऊं निहाल नहीं होना चाहूं धनवान बच्चे बन जाये बुद्धिमान बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.न जाने क्यूँ ऐसा लगता है आपकी लेखनी में कोई जादू है जो कहता है की चल उधर , वहां तुझे पढने को बहुत कुछ मिलेगा !

    jlsingh के द्वारा
    June 22, 2012

    आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन! मैंने अपने पिता जी (बाबूजी) को जैसा देखा वैसा ही लिखा. यह तो आपका बड़प्पन है जो मेरी लेखनी को सम्मान देते हैं. आपका बहुत बहुत आभार!

चन्दन राय के द्वारा
June 17, 2012

जवाहर जी , आपके पिता के महात्मय व्यक्तित्व पढ़कर आपके पिता से रूबरू हुआ , फिर आपने उत्न्हे उम्दा भाव से पिता को अपने दिल से श्रधा पुष्प भेंट किये , आपके पिता ने ही आपमें इतनी अच्छाई पैदा की है ,!

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रिय चन्दन राय जी, सादर अभिवादन! हर बालक में उसके पिता का अंतर्निहित गुण तो होता ही है कुछ समय और परिवेश के अनुसार बदल जाता है … मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मेरे अन्दर मेरे स्वर्गीय पिताजी के गुणों का कुछ अंश अवश्य हो …. ! आपका आभार!

Bubbly & Babu के द्वारा
June 17, 2012

wish u very happy Father’s day to my Papa.. आप हमेशा हमे दादा जी के बारे में बताया करते हैं और आज दादा जी की लघुकथा को jagran junction के blog में पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    मेरे प्यारे बच्चों, बस अपने दादाजी को आदर्श मानकर आगे बढ़ते चलो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीय भाई जबाहर जी, सादर ! जागs लोगन होल बिहान | दौग जा सब खेत -खलिहान || भाई, आज पता चला हम दोनों ज़ेबरिया हैं , ऐसे तो इ अंदाजा हमको पाहिले से था | आप ने पिता जी के अहसासों को बखूबी कविता में पिरोया है | हार्दिक आभार !!

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय गुंजन जी, सादर अभिवादन! आप हमारे ‘जेवरिया’ हैं जानकर सुखद अनुभूति हुई, अब यह जानने की इच्छा हो चली है कि आप कहाँ से हैं … अगर संभव हो तो बताने का कष्ट करें! आपके शब्द भी हमारे आंचलिक भाषा का प्रमाण दे रहे हैं. आपका आभार!

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

पचास कोस तक जब कोई माता या पिता अपने बच्चे की धुलाई नम्बर वन करते थे तो बच्चा रोते और सुबकते हुए कहता था की “मत मारो मुझको , रुक जाओ , अभी जोर से चिलाऊंगा तो मेरा प्यारा चाचा तुमको सबक सिखाने आ जायेगा” ….. विदेशों में तो सुना है की हरेक घर में टेलीफोन पर एक खास नम्बर वाला बटन दबा देने से बच्चों की पुलिस कुछ ही पलों में आ जाती है और माँ बाप की खूब अच्छे से खबर लेती है ….. सभी बच्चों कों अपनेपन वाली सम भाव से देखने वाली दृष्टि रखने वाले आपके पिता जी कों नमन बेहतरीन प्रस्तुति http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय गुरुदेव, सादर अबिवादन! आपकी शैली लाजवाब होती है और सत्य के करीब भी होती है. आपका बहुत बहुत आभार!

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय गुरुदेव, सादर अभिवादन! आपने कृष्ण भरद्वाज जी के पिता के प्रति समर्पित ब्लॉग को हम लोगों के साथ लिंक किया, यही तो आपकी महानता है, उनके द्वारा अपने माता पिता को समर्पित भावपूर्ण पंक्तियाँ निश्चय ही सराहनीय है!

chaatak के द्वारा
June 17, 2012

पिता वह दरख्त होता है जिसकी छाँव में बैठकर हर दुश्वारी अपने आप विलीन हो जाती है काश इस दरख्त की छाँव हमेशा के लिए होती !

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! पिता वह दरख्त होता है जिसकी छाँव में बैठकर हर दुश्वारी अपने आप विलीन हो जाती है काश इस दरख्त की छाँव हमेशा के लिए होती ! यह हम सभी महसूस करते हैं काश उनकी छत्रच्छाया हमेशा के लिए होती!

vasudev tripathi के द्वारा
June 17, 2012

जवाहर जी, पिता को समर्पित सुन्दर पंक्तियाँ.! इसीलिए आकाश से भी महान पिता होता है!

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय बासुदेव जी, सादर अभिवादन! पिता का महत्व अवर्णनीय है … स्वर्गादुच्च्तर: पिता! … वो तो मैंने उनके चरणों में कुछ श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं . आपका आभार!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीय जवाहर जी,सादर.अपने पिता की स्मृति को बखूबी शब्दों में ढाला है. प्रभु देना तुम मुझको इतना भूखा न रहे मेरा ललना आ जाये अगर कोई मेहमान सेवा कर हो जाऊं निहाल नहीं होना चाहूं धनवान बच्चे बन जाये बुद्धिमान बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय राजीव झा जी, सादर अभिवादन! आपका बहुत बहुत आभार!

jlsingh के द्वारा
June 17, 2012

इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का बिस्वास कमजोर हो न! मेरे बाबूजी का आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है …. कोशिश करता हूँ कि किसी का बुरा न चाहूं और हो सके तो भला कर सकूं!… अपने बेटे को देखता हूँ….. वह नित्य प्रतिदिन दादा दादी(के तस्वीर) को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लेता है …. बाबूजी, आपका दालान आज भी एक छोटा चिकित्सालय बनकर, आस पास के लोगों की छोटी मोटी बिमारियों से रक्षा कर रहा है … दीवाली के समय लक्ष्मी पूजा आज भी हो रही है. महाबीर जी की ध्वजा को अपने वर्तमान निवास स्थल पर हर साल आपके ही अनुसार विधिपूर्वक बदलता हूँ … आपने कई बार मुझे, या कहें कि अक्सर मुझे अपने साथ रखकर पूजा करने बैठते थे … पंडित जी अक्सर मेरे नाम से ही ‘शगुन’ निकालते थे …. और आप मुझे अपने साथ खेतों में ले जाते थे…. हल के ‘फाल’ की पूजा करवाने… रात में खीर और दाल पूरी खाता था और सुबह आप मेरे ही हाथों से ‘हल का लगना’ पकड़वा कर खेत जोतने का शुभारम्भ करते थे … यह वही समय है … वर्षा-काल के आरंभ का समय…. जब खेतों के जुताई की शुरुआत यानी कहें कि शुभारम्भ होता था … हर दृश्य आँखों के सामने से गुजर रहा है…. कभी कभी आप मुझे गोद में लेकर भी हल चलाते थे, माँ खुश होकर देखती थी और फिर मुझे अपने गोद में ले लेती थी … मेरी हर जिद्द आप पूरी करते थे … आज भी जब गाँव जाता हूँ, आप को चाचा, दादा कहनेवाले आपके गुणों का बखान करने में ही लगे रहते हैं. जिन बच्चों को आपने स्कूल भेजने की पहल की, वे सभी आपको श्रद्धा में सिर झुकाते हैं …. बाबूजी, आप मेरे आस पास ही हो न! माता जी और आप मेरे सपनों में हमेशा ही आते हो और मुझे यह लगता है कि आज भी आप साक्षात् मेरे साथ हो! … आप मुझसे दूर होना भी मत मेरे बच्चे में अगर मैं आपके गुणों का दशांश भी दे पाऊँ तो मुझे बड़ी खुशी होगी. वैसे उनमे आपके बहुत सारे गुण स्वत: मौजूद हैं … आपको मेरा कोटि कोटि नमन!

आर.एन. शाही के द्वारा
June 17, 2012

आता हूँ लौटकर. सुबह-सुबह की मजबूरी जानते ही हैं.

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    श्रद्देय शाही साहब, सादर अभिवादन! आपके लौटकर आने का इन्तजार तो करूंगा ही … अगर नहीं आए तो दस्तक भी दे जाऊंगा ! कभी-कभी शब्द से ज्यादा भावना ही ज्यादा मायने रखते हैं.आभार सहित!

Punita Jain के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय जवाहर भाई जी , सादर प्रणाम आपके पिता सद्गुणों के भण्डार थे, दया और करुणा के सागर थे , अच्छे संस्कारों के प्रदाता थे , बच्चों के चरित्र निर्माता थे | ऐसा पिता जिसे मिले वह भाग्यशाली होता है , पिता से मिले अच्छे संस्कारों से जीवन सफल होता है |

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय पुनीता जी, सादर अभिवादन! आपके उदगार मेरे लिए संग्रहनीय है! मैं भाग्यशाली तो हूँ और यही समझता हूँ कि मेरी भलाई में मेरे बड़े बुजुर्गों, माता-पिता, और मेरे शुभचिंतकों का ही हाथ है! आपका बहुत बहुत आभार!

akraktale के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय जवाहर जी भाई नमस्कार, पिताजी के बहुत सुन्दर आचार विचार और बच्चों से उनका प्यार, दिल खुश हो गया. अवश्य ही आप में आपके पिता की छवि देखकर बच्चे प्रसन्न होते होंगे.

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय अशोक भाई जी, नमस्कार! कोशिश करता हूँ कि अपने बच्चे को संस्कारित रखूँ. फुर्सत के क्षणों में मैं जरूर उन्हें अपने माता पिता के बारे में बताता रहता हूँ. वे अपने दादा से तो साक्षात्कार नहीं कर पाए पर दादी उनलोगों के साथ थी और वे लोग अपनी दादी का भरपूर प्यार ले पाए हैं …. आप सब की शुभकामना और मेरे माता पिता का आशीर्वाद मेरे साथ है. आपका बहुत बहुत आभार!

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय सिंह साहब सादर प्रणाम बाबू जी को समर्पित सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार….

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरनीय अजय जी, नमस्कार! आपका बहुत बहुत आभार!

allrounder के द्वारा
June 16, 2012

नमस्कार जवाहर जी, अपने पूजनीय पिताजी को समर्पित आपकी इस उत्कृष्ट रचना पर आपको हार्दिक बधाई !

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय सचिन जी, नमस्कार! आपका बहुत बहुत आभार!

bharodiya के द्वारा
June 16, 2012

जवाहर भाई आप के बाबूजी को प्रणाम और आप भी अपने बच्चों के लिए अच्छे बाबूजी साबित हो ऐसी शुभकामना ।

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय भरोदिया जी, सादर अभिवादन! आप लोगों की शुभकामना और मेरे बाबूजी का आशीर्वाद साथ है तो मैं भी अपने बच्चों के लिए वही प्रयास करता रहूँगा! अभीतक हमारे बच्चे संस्कारित हैं …

vikramjitsingh के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय जवाहर जी….सादर…. हम भी खेतों में ही पले-बड़े हैं….बस…..!! इस से आगे कुछ नहीं कहा जायेगा……!!! आपके पूजनीय बाबू जी को हमारा शत-शत नमन…..

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय विक्रम जी, सादर अभिवादन! जानकर अच्छा लगा की अप भी खेतों में ही पले-बड़े हैं. बस वही याद तो रह जाती है. मेरा भी आपके पिताजी को शत शत नमन और आपका आभार!

June 16, 2012

सादर प्रणाम! उनका ब्रहम वाक्य – “बेटा हो सके तो किसी का भला कर दो, पर किसी का बुरा चाहना भी मत!”………….नमन! ________________________________________________________________ काव्य सुन्दर………………अति सुन्दर …………….मिटटी और श्रधा की खुशबू लिए हुए………!

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    प्रिय अनिल जी, सादर! कोशिश करता हूँ कि मुझसे किसी का बुरा न हो और कोई मेरा अमित्र न बने! आप सबकी शुभकामनायें और बाबूजी का आशीर्वाद हमारे साथ है!

minujha के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय  जवाहर जी पिताजी के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा,ऐसे लोग हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित  रहते है,हम सबका नमन उन्हें

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    मीनू जी , सादर अभिवादन! और बहुत बहुत आभार आपका! स्मृतियाँ ही हमें अतीत से और अपने पूर्वजों से जोड़ कर रखती हैं ….

मनु (tosi) के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय जवाहर भाई जी , सादर प्रणाम !!! आपकी लेखनी और यादों ने मुझे मेरे पिताजी की याद दिला दी ,,, जिनके ऐसे पिता हों ,,, वो पुत्र तो आप जैसे होंगे ही …. आपके बाबू जी को मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ …. सादर !!

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय पूनम जी, सादर अभिवादन! आपके अपने पिताजी के प्रति श्रद्धासुमन के द्वारा जान पाया ki आपके ऊपर से पिताजी की छाया आठ साल की उम्र में ही उठ गयी थी और आपके द्वारा पितजी को पात्र लिखकर नदी में बहाना बहुत ही ह्रदय विदारक था ….. विधाता की नियति को हम नहीं जान पाते …. पर उनकी छाया हमारे ऊपर सर्वदा रहती है … आखिर परमपिता तो वही हैं .. आपका बहुत बहुत आभार …. कुछ भावनाएं हमसबकी आपस में जुड़ जाती हैं, इन प्रसंगों के माध्यम से… पुनश्च!

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    पितजी को पात्र को ‘पिताजी को लिखे पत्र’ पढ़ें कुछ गलतियाँ रह जाती हैं, टंकण के दौरान.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 15, 2012

कोटि कोटि प्रणाम बाबू जी को, नमन उनके योग्य पुत्र को. मुझे भी अपने पिता जिन्हें बाबू कहता था का स्नेह याद आ गया . …… बस धन्यवाद आदरणीय सिंह साहब जी, सादर अभिवादन के साथ.

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    श्रद्धेय कुशवाहा जी, सादर प्रणाम! मैं भी अपने पिताजी को ज्यादातर बाबू ही कहता था बाद मे थोड़ा पढ़ लिख जाने के बाद शिक्षकों द्वारा शिक्षित किये जाने के बाद बाबूजी कहने लगा और कहता रहा ! आपका भी आशीर्वाद चाहूँगा कि मै अपने बाबूजी के बताये रास्ते पर चलता रहूँ! …. आपका आभार !

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    June 23, 2012

    नयन नम हैं न रहने का गम है आदर्श दोनों के सामान सम हैं मिलकर पूरे करेंगे उनके सपने वो नहीं तो क्या हम सब हैं अपने वादा रहा मिल साथ निभायेंगे एक दिन जायेंगे जब दुनिया से हमारे बच्चे अपना कर्तव्य निभाएंगे

    jlsingh के द्वारा
    June 24, 2012

    परम आदरणीय श्रद्धेय कुशवाहा जी, सादर चरण स्पर्श ! वैसे तो मैं बाबूजी को अक्सर सपने में देखता था और उनका प्यार पाकर अभिभूत होता था ! आज शुबह के साढ़े चार बजे मुझे ऐसा लगा सच में उनसे साक्षात्कार हो गया …. आपमें मुझे बाबूजी के दर्शन हो गए … मैं धन्य हो गया ! जिसपर आप जैसे बुजुर्गों का साया हो, वह कभी भी अपने को अनाथ नहीं महसूस कर सकेगा! मेरे ब्लॉग को मेरा पूरा परिवार पढता है और वे सभी आपसे भी परिचित हैं … उन सबकी तरफ से आपको शत शत नमन! आपका आशीर्वाद हमारे साथ है! पुन: आभार!

pritish1 के द्वारा
June 15, 2012

सुन्दर विचारणीय…. सर मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है……. आप मेरी कहानी ऐसी ये कैसी तमन्ना का आनंद लें……आज ९ बजे उसका दूसरा भाग प्रकाशित कर रहा हूँ आप पहला भाग मेरे ब्लॉग पर देख सकते हैं………. कृपया अपने विचारों से मुझे अवगत करायें………

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    प्रिय प्रीतीश जी, सादर! मैंने आपके दोनों भाग पढ़े हैं और प्रतिक्रिया भी दी है … बहुत अच्छे ढंग से आप आगे बढ़ रहे हैं हरेक भाग के अंत में उत्सुकता बनी रहती है कि आगे क्या होगा! आपका मेरे ब्लॉग पर भी स्वागत है!

Santosh Kumar के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय सर ,..सादर प्रणाम बाबूजी समाज के आदर्श चरित्र थे ,..आपकी प्रेरणादायक भावपूर्ण श्रद्धांजलि पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा ,.बाबूजी को शत शत नमन

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय संतोष जी, सादर अभिवादन! आपका बहुत बहुत आभार! मैं अपने बाबूजी के पदचिन्हों पर चलता रहूँ यह कामना करता हूँ!

dineshaastik के द्वारा
June 15, 2012

भाई जवाहर जी, बहुत प्रेरक  एवं अनुकरणीय  लघुकथा….. वर्तमान  अर्थयुग  के परिवेश  में ऐसे चरित्रों का निर्माण बहुत ही मुश्किल  है। आपके पिता जैसे पात्र  सदा विस्मर्णीय होते हैं। नेहरु जी अपने इसी तरह के कृत्य से चाचा के नाम से प्रसिद्ध  हो गये। आपके  पिता को मेरी ओर से श्रद्धा सुमन एवं नमन………..

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, सादर अभिवादन! मैंने तो बतला ही दिया है कि यह बहुत ही पुराने युग की बात है तब अर्थ की और भौतिक सुखों की इतनी चाह न थी. मेरे पिताजी को गुजरे हुए भी लगभग ३२ साल हो गए हैं …. पर उनकी बहुत सारी बातें, यादे आज भी ज्यो की त्यों है ….. मेरे पिताजी सचमुच मेरे लिए और और तात्कालिक समाज के प्रेरणा स्रोत थे! आपका बहुत बहुत आभार! …. आपको बतला दूं कि मेरा नाम जवाहर लाल इसीलिये रखा गया क्योंकि जवाहर लाल नेहरू के बारे में जितनी भी जानकारी मेरे पिताजी को उस समय थी…. उन्हें यही नाम उपयुक्त लगा! पुनश्च !

Rajesh Dubey के द्वारा
June 15, 2012

बाबूजी जैसे चरित्र वर्तमान पीढ़ी से गायब हैं. निश्चित ही समाज वैसे ही चरित्रों से आगे बढ़ता है. सादगी,शिक्षा, श्रम को प्रतिष्ठित करने वाले बाबूजी जिस समाज में होंगे, निश्चय ही वह समाज विकाश पथ पर आगे बढेगा.

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय राजेश जी, नमस्कार! सादगी,शिक्षा, श्रम को प्रतिष्ठित करने वाले बाबूजी जिस समाज में होंगे, निश्चय ही वह समाज विकाश पथ पर आगे बढेगा.आपकी सद्भावना और श्रद्धासुमन बहुत ही अनमोल हैं … कोशिश जारी है कि मैं पिताजी के पदचिह्नो पर आगे बढ़ता रहूँ! आपलोगों की सद्भावना जरूर मुझे शक्ति प्रदान करेगी!

nishamittal के द्वारा
June 15, 2012

आपके पिया जी के प्रति आपका श्रद्धा स्मरण भावपूर्ण है.सिंह साहब नमस्कार.रचना भी आपके भाव प्रदर्शित करती है.

    nishamittal के द्वारा
    June 15, 2012

    कृपया पिता जी पढ़ें.क्षमा चाहती हूँ

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2012

    आदरणीय महोदया, नमस्कार! आपका आभार! हम सब अपने माता पिता के बहुत ही आभारी हैं, इसलिए जागरण ने याद दिलाया तो कुछ यादें अपने आप लिपिबद्ध होती गयीं!


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