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राजनीति है क्या भला!

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राजनीति (Politics) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों का कोई समूह निर्णय लेता है। सामान्यत: यह शब्द असैनिक सरकारों के अधीन व्यवहार के लिये प्रयुक्त होता है किन्तु राजनीति मानव के सभी सामूहिक व्यवहारों (यथा, औद्योगिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक संस्थाओँ में) में सदा से उपस्थित तत्व रहा है। राजनीति उन सामाजिक सम्बन्धों से बना है जो सत्ता और शक्ति लिये होते हैं।
राजनीति शब्द का विश्लेषण करें तो यह दो शब्दों, ‘राज’ और ‘नीति’ से बना है. राज मतलब राजा अथवा राज्य …. पहले पहल राजा, रजवारे हुआ करते थे और वे एक निश्चित भौगोलिक सीमा में बंधे भूभाग पर राज्य करते थे. अपने राज्य की प्रजा और अपना सिंहासन सुरक्षित रखना उनका परम कर्तव्य होता था. अपनी शक्ति विस्तार के लिए वे अगल बगल के राजाओं (राज्यों के नेता) से या तो सामान्य आग्रह कर अपने अधीन करना चाहते थे या फिर शक्तिबल, युद्ध कर के अपने अधीन कर लेते थे. थोड़ा और विश्लेषण करें तो साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल कर अपनी ताकत को बढ़ाते थे. इसे फिर कूटनीति भी नाम दिया गया. अच्छा राजा वह है जो युद्ध नहीं, अपनी कूट नीति (कुटिल बुद्धि ) का इस्तेमाल कर अन्य राज्यों यथा राजाओं को अपने अधीन रखे!
समझ में नहीं आ रहा शुरू कहाँ से करूँ?
पौराणिक युग की बात करूँ, तो इसमें सबसे पहले देवासुर संग्राम की चर्चा करनी होगी – पौराणिक कथा के अनुसार देवता लोग तो स्वयम स्वर्ग का सुख भोगते थे और असुरों को हमेशा निकृष्ट मानकर उसे पृथ्वी लोक पर राज करने के लिए, या कहें कि नाना प्रकार के कष्ट भोगने के लिए प्रतारित भी करते रहते थे. असुरों में चेतना लौटी तो वे भी स्वर्ग के सिंहासन के लिए देवताओं से युद्ध करने लगे! देवता पराजित होकर भगवान विष्णु के पास गए और उनके परामर्श अनुसार समुद्र मंथन हुआ और उससे निकले अमृत को बाँटने में भी कूटनीति का इस्तेमाल हुआ….
देवासुर संग्राम में ही देवाताओं की तरफ से लड़ने गए थे, राजा दशरथ और अपनी महारानी कैकेयी को दो वरदान दे दिए. फलस्वरूप राम को वनगमन करना पड़ा और सीता हरण के बाद रावण को मारने के लिए ‘विभीषण’ की सहायता लेनी पड़ी.
अब आते हैं महाभारत काल में – जन्म से अंधे होने के कारण धृतराष्ट्र बड़े होने के बावजूद राजा नहीं बनाये गए, जिसके संताप को वे जीवन भर न भुला सके और अपने साले शकुनी और पुत्र दुर्योधन के कुटिल चालों से पांडवों को समाप्त करने में कोई कसर न छोड़ी और अंत में वे श्री कृष्ण की कूटनीति के आगे हार गए!
ये सब बहुत पुरानी बाते हैं जो कुछ सिखाती है – पर हम सबक कहाँ लेते हैं ? फिर वही कुटिलता का सहारा लेकर अपनी सार्वभौमिकता को प्राप्त करने में सतत लगे रहते हैं.
इतिहास की बात करें तो भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता और आर्यों की सभ्यता से प्रारंभ माना जाता है! हिन्दू लोग हमेशा से सहिष्णु, और स्वतंत्रता में बिस्वास रखने वाले थे. फलस्वरूप वे आपस में ही बनते रहते थे जिसका फायदा पहले मुगलों ने उठाया फिर अंग्रेजों ने! सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश परकटा पंछी बन फड़फड़ाता रहा. आजादी के बाद भी जिन्ना और नेहरू की कूटनीति ने इसे दो हिस्सों में बाँट दिया, जिसकी त्रासदी आज भी हमसब ‘युधिष्ठिर’ की भांति झेल रहे हैं.
कहते हैं नेहरू और नेहरू खानदान ने इसे जी भरकर चूसा और आजतक चूस रहे हैं. दोष किसका? प्रजातंत्र में राजतंत्र की भांति एक ही खानदान के इशारों पर चलने को मजबूर हैं…… इसमे दोष किसका है????
कांग्रेस से जो भी अलग हुए उनका नामोनिशान मिट गया या घूम फिरकर उसी पार्टी में आ मिले.

कांग्रेस विचारधारा से अलग होकर श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रिय स्वयम सेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरू गोलवलकर जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर, 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और वे इसके पहले अध्यक्ष बने. फिर राष्ट्रिय जनतांत्रिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी आज भी मुख्य विपक्षी दल के रूप में है. श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में भाजपा 19 मार्च, 1998 से 13 मई, 2004 तक भारत की सत्ता में रही!श्री अटल बिहारी बाजपेयी का करिश्माई व्यक्तित्व अपने गठबंधन को बांधे रहने में सफल साबित हुआ, फिर भी ममता, जयललिता और समता (वर्तमान जे डी यु) आदि उन्हें बीच बीच में उद्वेलित करते रहने की हर संभव कोशिश से बाज नहीं आई. अन्दर अन्दर लालकृष्ण आडवाणी की महत्वाकांक्षा आड़े आती रही हालाँकि वे ‘उप प्रधान मंत्री’ थे और बाजपेयी जी के साथ ही संसद में बैठते थे. वही आडवाणी जी तब नरेन्द्र मोदी को समर्थन करते दिखे, जब बाजपेयी जी ने कहा था (गुजरात दंगो के बाद)-राज धर्म का पालन नहीं हुआ! वही आडवाणी जी अन्दर ही अन्दर मोदी जी के जड़ में गरम पानी डालने का कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहते – चाहे वह नीतीश जी के बहाने हो या शत्रुघन सिन्हा के बहाने!
आज भाजपा आत्ममंथन करने के बजाय अपने पाँव को घायल करने में लगी है. अभी आपने रामजेठमलानी को निकाला फिर क्या यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा को भी निकालेंगे? फिर और विरोधी सुर पैदा न होंगे, यह कैसे जानते हैं? कांग्रेस खुश है और मजे ले रही है. आप संसद नहीं चलने देते, भारत बंद कराते हैं, पर ममता के अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़े नहीं होते? फिर यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ममता आगे आपको समर्थन करेगी. ममता को धोखा देने के लिए मुलायम सिंह भी तैयार रहते हैं और प्रधान मंत्री बनने के मंसूबे पाल लेते हैं. पूरे परिवार मिलकर भी उत्तर प्रदेश तो सम्हाल नहीं पा रहे, देश सम्हालेंगे?
भाजपा, कांग्रेस आलाकमान सोनिया जी के विदेशी दौरों का तो हिशाब मांगती हैं, पर गडकरी की पूर्ती में आपूर्ति करती रहती हैं!…..भाजपा वाले, अभी भी वक्त है, सम्हल जाओ आत्म-मंथन, आत्म चिंतन, संघ शरणम जो भी करो, पर अपने पर न कतरों…… कांग्रेस से सब परेशान हैं, पर विकल्प बनने की कोशिश तो करो. संसद ठप्प करके क्या साबित करना चाहते हो? लोकपाल बिल के समय भी अपनी कलई खोल चुके हो. अरविन्द केजरीवाल से अभी भले न डरो, पर एक समय आ सकता है, कि जनता उसके समर्थन में उठ खड़ा हो. मीडिया अभी तक केजरीवाल के साथ है और आज के समय में मीडिया का बड़ा रोल है!… हम कांग्रेस को जितना भी गाली दे लें, पर जबतक सशक्त विकल्प बनकर नहीं उभरेंगे, जनता क्या करेगी? हो सकता है तबतक सब्सिडी वाले गैस सिलिंडर की संख्या में बढ़ोत्तरी कर, पेट्रोल डीजल के मूल्यों में कटौती कर, मूल्यवृद्धि में लगाम लगाकर तात्कालिक सहानुभूति बटोर ले. कम से कम कांग्रेस में सभी एक रिमोट कंट्रोल पर एकमत तो हैं!

चाणक्य ने नंदवंश का नाश करने के लिए ‘चन्द्रगुप्त’ का सहारा लिया, ‘उसे’(चन्द्रगुप्त को) युद्ध कौशल सिखाने के लिए सिकन्दर की सेना में शामिल कराने से भी परहेज नहीं था. वो कहते हैं न ‘युद्ध और प्यार में सब जायज है’. फिर दुविधा क्यों? ‘चाल’ ‘चरित्र’ और ‘चेहरा’ का नारा किस दिन के लिए. ‘ए पार्टी विथ डिफरेंस’ कहने से नहीं होता, साबित करना पड़ता है. आडवाणी जी ने दो दो बार यह साबित किया है. उमा भारती और कल्याण सिंह को फिर से मौका दो, शायद कुछ ‘कल्याण’ हो जाय! सुषमा जी और अरुण जेटली विद्वान और प्रखर नेता हैं, इनकी धारा को कुमार्ग पर मत मोड़ो!
राजनीति का कुछ भी अनुभव न होने के बावजूद मैंने बहुत सारे सुझाव दे डाले. यह सब समय की मांग के अनुसार मैंने अपनी अभिब्यक्ति दी है. आम आदमी और क्या कर सकता है. आम आदमी की ही तो बात कर सकता है. वैसे देश तो चलता रहेगा – या तो अमेरिका के इशारे पर या फिर पकिस्तान का डर दिखाकर! हम सब देश के आगे कुर्बान हो जायेंगे.’सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं’!

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46 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rakesh kumar yadav के द्वारा
April 22, 2016

ुी  रोहिलॊकजर

sudhajaiswal के द्वारा
December 4, 2012

आदरणीय जवाहर जी, सादर अभिवादन, राजनीति में भ्रष्ट नीतियों का राज हो गया है लोकतंत्र के मायने ही बदल गए हैं | राजनीति पर बहुत ही सटीक और सार्थक लेख के लिए बहुत बधाई |

    jlsingh के द्वारा
    December 5, 2012

    आदरणीया सुधा जी, सादर अभिवादन! आपकी सार्थक प्रतिक्रिया का आभार!

vinitashukla के द्वारा
December 3, 2012

पुराना युग हो या आधुनिक काल- राजनीति सदैव प्रासंगिक होती है. राजनीती के सुंदर विश्लेष्ण हेतु बधाई जवाहर जी.

    jlsingh के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरणीया विनीता, सादर अभिवादन! आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार!

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 3, 2012

राजनीती एक ऐसी नीति है जिसका कोई अत पता नही है सार्थक लेख , बधाई हो सर आपको ! http://praveendixit.jagranjunction.com/ हमें भी आप अपने कमेंट्स से सही राह दिखाएं . धन्यवाद !

    jlsingh के द्वारा
    December 3, 2012

    धन्यवाद, प्रवीन जी!

prabhakar / ITB के द्वारा
December 2, 2012

प्रिय ब्लॉगर मित्र, हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है। शुभकामनाओं सहित, ITB टीम पुनश्च: 1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। 2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

    jlsingh के द्वारा
    December 3, 2012

    आदरणीय प्रभाकर जी, सादर अभिवादन! कृपया डिरेक्टरी का लिंक भी देने की कोशिश करें या पूरा पता दें! आपका आभार!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 1, 2012

आदरणीय भाई जवाहर जी, सादर अभिवादन !…….. वस्तुतः आप ने राजनीति के वहाने देवासुर -संग्राम में राजा दशरथ की भूमिका की उपस्थिति दिखाकर त्रेता और धृतराष्ट्र तथा श्री कृष्ण की चर्चा कर द्वापर युग के पौराणिक इतिहास के आभास के साथ ही मध्य और आधुनिक काल की समस्त आवश्यक झांकियां प्रस्तुत करते हुए हम पाठकों को अद्यतन कर समसामयिक दृष्टिबोध दिया सो सारा हिन्दुस्तान देख रहा है ! इस आलेख के लिए बधाई हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं ! हार्दिक आभार !1

    jlsingh के द्वारा
    December 1, 2012

    आदरणीय गुंजन साहब, सादर अभिवादन! मेरा तात्पर्य तो आप समझ ही गए हैं! आम आदमी की हालत और विकल्प का न होना बहुत मुश्किल में की घड़ी लग रही है! इसलिए मेरा दृष्टिकोण पुरातन से अद्यतन तक यही लगा कि जन कल्याण के लिए थोड़ी कूटनीति, थोड़ी राजनीति हर समय की मांग रही है! बशर्ते कि वह सचमुच का जन कल्याण हो रहा हो! आपकी विस्तृत, समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का आभार!

manoranjanthakur के द्वारा
December 1, 2012

राजनीति पर सानदार पोस्ट … बेहतरीन … बहुत बधाई

    jlsingh के द्वारा
    December 1, 2012

    बहुत बहुत आभार मनोरंजन साहब!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 29, 2012

आदरणीय जवाहर जी सादर अभिवादन, आपके लेख पर क्या प्रतिक्रिया दूं. बस बधाई स्वीकार कीजिये. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरनीय सिद्दकी साहब, नमस्कार! आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया का आभार!

nishamittal के द्वारा
November 29, 2012

सिंह साहब,ठोस सक्रिय और देश के लिए प्रतिबद्ध विपक्ष का अभाव सबसे बड़ी कमी है,और जनता इसीलिये विकल्पहीन है अच्छा विश्लेषण

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन ! मुख्य विपक्षी दल आज उधेरबुन में है … वह सोच रही है कि स्वत: ही सत्ता उसके हाथ में आ जायेगी, पर ऐसा कैसे संभव है … कुछ तो सकारात्मक दिखना चाहिए ! आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का आभार !

Santosh Kumar के द्वारा
November 29, 2012

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम बहुत ही प्रभावी आलेख के लिए हार्दिक आभार ,…पहले के राजा अधिकांशतः राज्यविस्तार और प्रजाहित में कूटनीति करते थे ,…..आज के नेता अपना हित साधने में देश की दलाली करते हैं ,… आम आदमी और क्या कर सकता है. आम आदमी की ही तो बात कर सकता है. वैसे देश तो चलता रहेगा – या तो अमेरिका के इशारे पर या फिर पकिस्तान का डर दिखाकर! हम सब देश के आगे कुर्बान हो जायेंगे.’सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं’! …….कदापि नहीं झुकायेंगे … देश जरूर जीतेगा ….सादर वन्देमातरम !

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय संतोष जी, सादर अभिवादन! आपका प्रयास बहुत ही सकारात्मक है और जज्बा भी … आप आगे बढ़ें, हम सब आपके साथ हैं! वन्दे मातरम! ….वन्दे मातरम!

vikramjitsingh के द्वारा
November 28, 2012

जय हो प्रभु……आदरणीय जवाहर जी……कैसे हैं आप…….??? आप को तो दिल्ली में सोनिया जी के साथ वाली कुर्सी पर बैठने का मौका मिलना चाहिए……भई….बहुत बढ़िया सुझाव दिए हैं आप ने तो……दिल बाग-बाग हो गया…..आप की पोस्ट पर आना सार्थक हुआ……बहुत-बहुत धन्यवाद आपका…..जय हो…..!!!

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरनीय विक्रमजीत सिंह जी, सादर अभिवादन! आप मुझे सोनिया जी के साथ क्यों बैठना चाहते हैं, वहां तो मनमोहन जी हैं ही … और लोग भी है …मुझे अपने साथ रखिये … इतनी भी बेरुखी न दिखलाइये. काफी दिनों बाद आप दर्शन दिए हैं! आपका बहुत बहुत आभार!

Rajesh Dubey के द्वारा
November 28, 2012

राजनीती की उचित विश्लेषण और व्याख्या यहीं है. बिना राजनीतिज्ञ हुए यह सटीक विश्लेषण राजनीतिज्ञों के आँख खोलने के लिए काफी है.

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरनीय राजेश जी, सादर अभिवादन! आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का आभार!

akraktale के द्वारा
November 28, 2012

आदरणीय जवाहर जी भाई                        नमस्कार, आज सारे दल बिखर गये हैं बीजेपी जो समझती थी कि कांग्रेस का विकल्प वही है. आज भी उनको ये भ्रम है किन्तु केजरीवाल यह बहुत पहले से जानते थे और इसी रणनीति के तहत उनने दोनों पार्टियों को देश कि जनता के सामने बेनकाब किया है. अब इन्तजार सिर्फ इस बात का है कि केजरीवाल जनता को अपने उम्मीदवारों के प्रति किसी तरह से आकर्षित करते हैं. अभी तक कि उनकी व्यूह रचना कमाल की रही है. देखें और इंतज़ार करें.

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय अशोक जी भाई, नमस्कार! अरविन्द केजरीवाल के पास लगभग एक साल का समय है, अगर उसका वह सही इस्तेमाल करते हैं तो संभव है कुछ सीटें जीतने में सफल हो जाय, पर पूरी ब्यवस्था को बदलना उतना आसान नहीं होगा. अभी भी बहुत सारे लोग सोच रहे हैं, इधर जाएँ या उधर जाएँ … कुछ और अच्छे विद्वान और कुशल आदमी को उनके साथ मिलना चाहिए!… लोग सोंच रहे हैं टीम एना भी दूर से देख रही है ..दरअसल सबकी अपनी अपनी महत्वाकांछा आरे आ जाती है. टीम भावना से काम करने की जरूरत है और उद्देश्य पर ध्यान केन्द्रित होना चाहिये!…. अब इन्तजार सिर्फ इस बात का है कि केजरीवाल जनता को अपने उम्मीदवारों के प्रति किसी तरह से आकर्षित करते हैं. अभी तक कि उनकी व्यूह रचना कमाल की रही है. देखें और इंतज़ार करें. बिलकुल सही हमलोग इंतज़ार जरूर करें और उन्हें नैतिक समर्थन देते रहें! आपका बहुत बहुत आभार!

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 28, 2012

स्वागत है आदरणीय जवाहर जी ,,,अबतो राजनीति सेवा के लिए नहीं , एक खेल है जिसमे शय और मात होती है

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय यतीन्द्रनाथ जी, सादर अभिवादन! शय और मात में बेचारी जनता यानी आम आदमी ही तो पिसता है! इसलिए एक आम आदमी का कर्तव्य निभाना चाहिए! आपकी प्रतिक्रिया का आभार!

yamunapathak के द्वारा
November 27, 2012

जवाहर जी राजनीति पर लिखे इस ब्लॉग में आप ने विस्तृत विवेचना की है.और सही आम आदमी का दर्द भी बयान किया वह क्या कर सकता है?‘चाल’ ‘चरित्र’ और ‘चेहरा’ का नारा किस दिन के लिए.बिलकुल सही. साभार

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का आभार! काश की भाजपा अभी भी चेत जाय, नहीं तो भगवान तो मालिक है ही!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 27, 2012

उमा भारती और कल्याण सिंह को फिर से मौका दो, शायद कुछ ‘कल्याण’ हो जाय! सुषमा जी और अरुण जेटली विद्वान और प्रखर नेता हैं, इनकी धारा को कुमार्ग पर मत मोड़ो!..केजरीवाल का भी स्वागत करो एक तरह के लोग कहीं तो मिलो इसे हम भी दोहराते हैं जवाहर भाई ..अच्छे नेताओं का वैसे भी अकाल पड़ता जा रहा है जिनमे कुछ दम ख़म दिखा वे लोग कुछ तो चल ही बसे ….अब जो बचे हैं नुक्ताचीनी में ही न फंसे रह जाएँ अमरीका पाक ही क्या उधर चीनी फिर से ६२ की तरह लाखों लाख जमा हो रहे हैं हम आपस में ढोल ही बजाते ….. अच्छी जानकारी राज +नीति पर आभार भ्रमर ५

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! मुझे जितना समझ आया मैंने कोशिश किया. आगे तो इन नेताओं को सोचना है …. सचमुच अच्छे नेताओं का अकाल पड़ गया है. अच्छे लोग राजनीति में जाना चाहते ! .. राजनीति इतनी गंदी हो गयी है.. फिर भी कीचड़ में कमल की तलाश जारी रखनी चाहिए ! चीनी या अमरीकी या पाकिस्तनी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते अगर हम एक हों! … आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का आभार!

rekhafbd के द्वारा
November 27, 2012

आदरणीय जवाहर जी ,… हम कांग्रेस को जितना भी गाली दे लें, पर जबतक सशक्त विकल्प बनकर नहीं उभरेंगे, जनता क्या करेगी? जनता भी सशक्त विकल्प को ढूँढ़ रही है ,राजनीति पर बढ़िया विश्लेष्ण ,बधाई

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय रेखा जी, सादर अभिवादन! उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार!

yogi sarswat के द्वारा
November 27, 2012

ये सब बहुत पुरानी बाते हैं जो कुछ सिखाती है – पर हम सबक कहाँ लेते हैं ? फिर वही कुटिलता का सहारा लेकर अपनी सार्वभौमिकता को प्राप्त करने में सतत लगे रहते हैं. इतिहास की बात करें तो भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता और आर्यों की सभ्यता से प्रारंभ माना जाता है! हिन्दू लोग हमेशा से सहिष्णु, और स्वतंत्रता में बिस्वास रखने वाले थे. फलस्वरूप वे आपस में ही बनते रहते थे जिसका फायदा पहले मुगलों ने उठाया फिर अंग्रेजों ने! सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश परकटा पंछी बन फड़फड़ाता रहा. आजादी के बाद भी जिन्ना और नेहरू की कूटनीति ने इसे दो हिस्सों में बाँट दिया, जिसकी त्रासदी आज भी हमसब ‘युधिष्ठिर’ की भांति झेल रहे हैं. कहते हैं नेहरू और नेहरू खानदान ने इसे जी भरकर चूसा और आजतक चूस रहे हैं. दोष किसका? प्रजातंत्र में राजतंत्र की भांति एक ही खानदान के इशारों पर चलने को मजबूर हैं…… इसमे दोष किसका है???? कांग्रेस से जो भी अलग हुए उनका नामोनिशान मिट गया या घूम फिरकर उसी पार्टी में आ मिले. मैं कांग्रेस का जन्मजात और धुर विरोधी होने के बावजूद ये मानता हूँ की अगर इस देश में किसी को राजनीती करनी आती है तो वो सिर्फ कांग्रेस ही है क्यूंकि और पार्टियाँ खीचतान में ही लगी रहती हैं और इसी का फायदा हमेशा ही कांग्रेस ने उठाया है ! श्री सिंह साब , आपने राजनीती के उदय से लेकर उसके पतन तक का खाका खींच दिया है !

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरनीय योगी जी, सादर अभिवादन ! आपने मूल बात कह डाली है! “किसी को राजनीती करनी आती है तो वो सिर्फ कांग्रेस ही है क्यूंकि और पार्टियाँ खीचतान में ही लगी रहती हैं और इसी का फायदा हमेशा ही कांग्रेस ने उठाया है!” एक बात यहाँ मैं आपके लिए याद दिलाना चाहूँगा- रंगभूमि उपन्यास में प्रेमचंद ने अपने नायक ‘सूरदास’ के मुंह से कहलवाया है – “हार कर तुम्ही से खेलना सीखेंगे!” यह बात तब सूरदार ने अंग्रेजो के लिए कही थी. आज काले अंग्रेजों के लिए क्या यह लागू नहीं होती? आपकी उपयोगी प्रतिक्रिया के लिए आभार!

sinsera के द्वारा
November 27, 2012

सर जी नमस्कार, गंभीर विषय है, पढ़ कर सहमत तो हुआ जा सकता है, परन्तु मेरी जैसी मोटी बुद्धि वाले सिर्फ गर्दन ही हिला सकते हैं , कमेन्ट क्या करें..अपने बड़ी मेहनत से शोधपूर्ण लेख तैयार किया है, वास्तव में मैं हतप्रभ हूँ..स्थिति का तार्किक विश्लेषण करने के लिए आपको बधाई..

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरनीय सरिता बहन, सादर अभिवादन! जब भाई-बहन का रिश्ता चला आ रहा है तो ‘सर’ कहकर शर्मिंदा तो न कीजिये!…. अपना छोटा भाई बनाये रखिये. आपकी बधाई और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का इंतज़ार हमेशा रहता है साथ ही आपके आलेखों का भी मैं इन्तजार ही करता रहता हूँ. सादर आभार!

    sinsera के द्वारा
    December 1, 2012

    अरे भाई साहब , ऐसा विशेष प्रभाव लाने के लिए कहा जाता है ..

Mohinder Kumar के द्वारा
November 27, 2012

जवाहर जी, राजनीति के बारे में मेरी जानकारी बहुत अच्छी नहीं है परन्तु अनुभव यह रहा है कि सभी नेता एक ही थैली के चच्टे बट्टे है… लोगों के सामने झगडते हैं और रात में साथ महफ़िल सजती है. आम आदमी अपने बलबूते पर रोटी खा कमा रहा है और देश भी फ़िलहाल भगवान भरोसे ही चला जा रहा है वर्ना इतने बडे बडे घोटालों के बावजूद देश कैसे चलता रहता. लिखते रहिये.

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय मोहिंदर कुमार जी, सादर अभिवादन! आपने बिलकुल सही कहा है – सभी नेता एक ही थैली के चच्टे बट्टे है… लोगों के सामने झगडते हैं और रात में साथ महफ़िल सजती है. हम सब आम आदमी अपने बलबूते पर रोटी खा कमा रहा है और देश भी फ़िलहाल भगवान भरोसे ही चला जा रहा है, वर्ना इतने बडे बडे घोटालों के बावजूद देश कैसे चलता रहता. सादर आभार!

November 27, 2012

सिंह साहब ,बहुत ही अच्छा आलेख , आईना दिखा दिया बधाई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आज भाजपा आत्ममंथन करने के बजाय अपने पाँव को घायल करने में लगी है. अभी आपने रामजेठमलानी को निकाला फिर क्या यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा को भी निकालेंगे? फिर और विरोधी सुर पैदा न होंगे, यह कैसे जानते हैं? कांग्रेस खुश है और मजे ले रही है. आप संसद नहीं चलने देते, भारत बंद कराते हैं, पर ममता के अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़े नहीं होते? फिर यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ममता आगे आपको समर्थन करेगी. ममता को धोखा देने के लिए मुलायम सिंह भी तैयार रहते हैं और प्रधान मंत्री बनने के मंसूबे पाल लेते हैं. पूरे परिवार मिलकर भी उत्तर प्रदेश तो सम्हाल नहीं पा रहे, देश सम्हालेंगे?

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय डॉ. हिमांशु, सादर अभिवादन! कोशिश करता हूँ कि जनमानस की राय नेताओं तक पहुंचे, पर ये इतने स्वार्थी और आत्मश्लाघा से परिपूर्ण हैं कि इन्हें कुछ दीखता ही नहीं. रोज रोज की संसद की कार्रवाई का नतीजा देख ही रहे हैं! किस्सी को आम आदमी की चिता नहीं है, सब अपनी रोटी सेंकने में लगे हैं! …. आपकी प्रतिक्रिया का आभार!

November 27, 2012

जवाहर भाई आज के दौर में अपने पाठ से भटकी हुई भाजपा को बड़ी ही उचित और नेक सलाह आपने दी है। भाजपा अगर वक़्त रहते नहीं चेती  तो जनता के पास कोई बिलकल्प नहीं बचेगा और मजबूरन फिर से कांग्रेस की तरफ मुड जाएगी…. काश इस लेख को भाजपा के शीर्ष नेता और प्रवक्ता पढ़ते और कुछ सबक सीखते। जय हिन्द साभार !

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय डॉ. साहब, नमस्कार! मेरी समझ में जो आया लिख दिया, भाजपा शीर्ष नेता सब समझते हैं पर अभी वे लोग उधेरबुन में हैं? कांग्रेस चलें चल रही है और भाजपा अपना सर धुन रही है. आम आदमी का क्या है? माया मिली न राम! अरविन्द केजरीवाल जोर लगा रहे हैं पर उनकी पहुँच कुछ शहरी मतदाता तक ही सीमित है, वह भी कितना सफल होते हैं यह तो वक्त ही बताएगा! आपकी, हम सबकी चिंता है की कोई तो विकल्प बन कर उभरे!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 27, 2012

जी, सादर बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    November 29, 2012

    प्रणाम महोदय! हौसला आफजाई का शुक्रिया!


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