jls

जो देखता हूँ, वही लिखता हूँ

427 Posts

7688 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3428 postid : 585294

एक और सामूहिक बलात्कार!

  • SocialTwist Tell-a-Friend

एक और सामूहिक बलात्कार!
१६ दिसंबर २०१२ को बीते हुए लगभग नौ महीने हो गए. उस दिन की काली रात दिल्ली की थी और २२ अगस्त की काली रात मुंबई की थी. क्या फर्क पड़ता है किसी को. दिल्ली और मुंबई होने से हो हंगामा ज्यादा होता है…. राजनीति भी ज्यादा होती है…. संसद तक में गूँज सुनाई पड़ जाती है, कुछ झंडे चमक जाते है, रास्ते बंद हो जाते हैं, संसद ठप्प हो जाती है. पुलिस और गृह मंत्री के बयान आ जाते है …कुछ आरोपी पकड़ भी लिए जाते हैं …उसके बाद शुरू होती है, न्यायिक प्रक्रिया और सब शांत. फिर करते रहते है, कोई बड़ी घटना का इन्तजार! … इस बीच घटनाएँ घटती रहती है. टी वी या प्रिंट मीडिया के किसी कोने में खबर आ भी जाय तो सब इसे स्वाभाविक प्रक्रिया मानकर शांत हो जाते हैं.
क्यों किसी मासूम, नाबालिग के साथ हुआ जुर्म उतनी सुर्खियाँ और सहानुभूति नहीं बटोर पाता, क्यों उसके साथ हुए जुर्म को उतनी तरजीह नहीं दी जाती … तरजीह देने से भी किसी न्यायाधिपति के कानों पर जूँ नहीं रेंगती. त्वरित न्यायालय का क्या मतलब होता है? अगर त्वरित अदालतें भी उसी रफ़्तार से चलेंगी तो घटनाएँ त्वरित गति से घटती जायेंगी, अपराधी गिरफ्तार होते रहेंगे. फिर जेल भी अपराधियों से भर जायेंगे, और जेल निर्माण हो जायेंगे पर अदालतें अपनी रफ़्तार से चलेंगी. अपराध करने के लिए २४ घंटे और ३८५ दिन…. फैसला सुनाने के लिए कुछ घंटे, नियमित अवकाश के साथ. क्या अब कानून की पढाई पढ़ने में लोगों की रूचि कम हो गयी है या किसी भी अदालत के बाहर बैठे वकीलों की दुर्दशा देखकर कानून पढ़ना नहीं चाहते! ये वकील लोग भी क्या सचमुच किसी अपराधी को सजा दिलाना चाहते हैं कि अपनी जेबें गरम करना जानते हैं.
अगर किसी इंजीनियर या डाक्टर से गलती हो गयी तब तो ढेरों सवाल पूछे जायेंगे, पर वकील या न्यायाधीश की गलती हो तो ऊपर का न्यायालय और उसके वकील और जज और ज्यादा फीश और ज्यादा समय … आखिर इन सबका अंत कहाँ जाकर होगा? अपराध बढ़ते ही जायेंगे क्योकि वे जानते है कि सजा तो होनी नहीं है,… केस चलते रहेंगे. कभी न कभी बाहर छूट कर आ जायेंगे और बड़े गर्व से मुस्कुराएंगे.
अपराध करने वाला कोई बड़ा शक्स हो तो उसके ऊपर हाथ डालने में पुलिस भी सौ बार सोचेगी और तबतक राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकते रहेंगे. मुझे यह समझ में नहीं आता ये तथाकथित बड़े लोग कब आम आदमी बन कर सोचेंगे. एक महिला, लड़की या बालिका जो इस दुष्कर्म का शिकार होती है कितनी गंभीर शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरती हैं और कितना संताप उनके रिश्तेदारों को होता है!
जज साहब, सुरक्षा कर्मी, राजनीतिक दल, समाज सेवी संस्थाएं, मीडिया कर्मी, साहित्यकार गण, सभी धर्मावलम्बियों, आम आदमी सबसे मेरी हाथ जोड़कर प्रार्थना है – आप एक बार उस पीड़ित की जगह पर खुद को या अपने परिवार के किसी सदस्य को रखकर सोचिये – आप पर क्या बीतती? आपको खुद जवाब मिल जाएगा… इसके लिए कोई सत्संग या चिंतन शाला की जरूरत नहीं पड़ेगी, आप को अपने आप सत्य के दर्शन हो जायेगे! अपने अन्दर अवश्य झांकिए!

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

5 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
August 24, 2013

जवाहर लाल जी आपने फिर से बुझी हुई चिंगारी भड़का कर भारत के गृह मंत्री, दिल्ली मुम्बई पुलिस के आला , बचाव पक्ष के वकील और न्यायपालिका में न्याय की पुस्तक खोलकर चैन की शांस लेने वालों की दिल की धड़कन बढ़ा दी ! फ़ास्ट ट्रेक पर चलने वाली न्यायपालिका की स्पीड ये है (१६ /१२/२०१२ -वो काली रात बेचारी लड़की की आत्मा अभी तक तड़प रही है, न्याय मांग रही है ) तो नॉर्मल चाल पर चलने वाली न्याय पालिका, तो फिर सुहान अल्ला होगी ! सोये हुओं को जगाने वालों के लिए एक बहुत ही सार्थक लेख के लिए बधाई !

Rajesh Dubey के द्वारा
August 24, 2013

आपने मूल-मंत्र ही समाज को दे दिया है,”आप एक बार उस पीड़ित की जगह पर खुद को या अपने परिवार के किसी सदस्य को रखकर सोचिये.” जिस दिन लोग इस मंत्र का प्रयोग करना सिख जायेंगे, निश्चित ही देश में इस तरह के गलत कम रुक जायेगा.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 23, 2013

प्रिय जवाहर जी भयावह स्थिति है जितनी ही चर्चा होती है रोकने की कोशिश ढोल नगाड़े बजते हैं उतने ही नट नटिनी तमाशा दिखाने मैदान में और आ जाते हैं …विचारणीय आलेख क्या होगा इस देश का ? भ्रमर ५

Santlal Karun के द्वारा
August 23, 2013

बलात्कार-जैसे अत्यंत घृणित, अमानवीय, क्रूरतम दुष्कर्म पर प्रासंगिक आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
August 23, 2013

आदरणीय बेहद संवेदनशील विषय ! हतप्रभ आधी आबादी है!


topic of the week



latest from jagran