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एक कारीगर/कर्मचारी की कविता...

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रंग कोयले का काला है, जलकर दिया उजाला है,
तापित होकर ठंढा पानी, भाप की शक्ति सबने जानी.
बिजली भले नहीं दिखती है, इससे मृत भी नृत्य करती है.
बड़े छोटे सब कल करखाने, बिजली की लीला सब जाने.
रेल क्रेन या अन्य मशीने, मृत बने गर बिजली छीने
कारीगर हो या मजदूर, घर से रहता हरदम दूर.
साइरन की मीठी धुन सुन, बिस्तर छोड़े होकर निर्गुण.
चश्मा हेलमेट बूट पहनकर, आता वह साइकिल पर चढ़कर.
हाजिरी लेती सजग यन्त्रिका, देरी से हो स्वत: दण्डिता.
घर्र घर्र आवाजे करती, अनेक मशीनें चलती रहती. .
पाना, पेंचकस, और हथौड़ा, सामने टेबुल लम्बा चौड़ा.
पढ़े लिखे कुछ मन में सोचे, अनपढ़ अपना हाथ न खींचे.
टाइम टेबुल बनी हुई है, बॉस की भौहें तनी हुई है.
अपनी गति से चले मशीने, मानव देह से बहे पसीने.
गलती छोटी गर हो जाती, खून करीगर की बह जाती.
तापित लोहा द्रव बन जाता, शत सोलह डिग्री खौलाता
अपनी ड्यटी नित्य निभाए, सकुशल अगर वो घर आ जाए,
पत्नी बच्चे खुश हो जाते, बैठ के थोड़ा वे सुस्ताते.
मिहनत का फल उसको मिलता, एक मास जिस दिन हो जाता.
घर का राशन लाना होगा, कर्जा किश्त चुकाना होगा.
पत्नी को साड़ी की आशा, नए खिलौने ला दे पापा.
बोनस जिस दिन वह पाता है, सबसे ज्यादा सुख पाता है.
कपड़े नए बनाने होंगे, घर पर कुछ भिजवाने होंगे.
भूल के सारे रीति रिवाज, बॉस की सुनता बस आवाज.
अर्थ नीति का पालन करता, देश विकास में इक पग धरता
नेता अवसर खूब भुनाता, मालिक से चंदा जो पाता,
लेखक कवि जो भाव जगाये, सुन्दर शब्द कहाँ से पाये,
बातें करता लम्बी चौड़ी, पगार, पोंगा और पकौड़ी
‘तीन शब्द’ से गहरा नाता, ‘पोंगा’ उसको समय बताता
चाय संग खाए ‘पकौड़ी’, ख़त्म ‘पगार’ बचे न कौड़ी

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
November 4, 2014

वाह ! सच है जवाहर जी पगार पोंगा और पकौड़ी ….इस कविता का और भी एक बेहद संवेदनशील विषय अपने उठाया है सेफ्टी पर ध्यान जो कल कारखाने का सबसे अहम पहलू है …safety means safe tea ise padh kar jamshedpur ka chitra kheench jata hai

sadguruji के द्वारा
October 23, 2014

आदरणीय सिंह साहब आपके अनुभव और ह्रदय से निकली हुई बहुत सरल,सुन्दर और प्रेरक रचना ! मंच पर इसे प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक आभार ! आपको और आपके समस्त परिवार को दिवाली की बहुत बहुत बधाई !

    jlsingh के द्वारा
    October 23, 2014

    आपके आशीर्वाद से खुश हुआ … आज दीवाली है, आपको भी बहुत बहुत शुभकामना और अभिनन्दन !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
October 21, 2014

sundar v sarthak post hetu aabhar आपको दीपावली की बधाई …

    jlsingh के द्वारा
    October 22, 2014

    हार्दिक आभार आदरणीया शिखा जी, आपको भी दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

Rajesh Dubey के द्वारा
October 20, 2014

शब्दों के चित्र में कारीगर साक्षात दिख रहा है. सुन्दर कविता, वधाई.

    jlsingh के द्वारा
    October 22, 2014

    उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक अबहर आदरणीय श्री राजेश दुबे जी!

ranjanagupta के द्वारा
October 20, 2014

आदरनीय जवाहर जी !बहुत बधाई आपने कारीगर और मजदूर वर्ग का सटीक चित्र खींचा है !यह सब बड़े कारखानों और ऊ ० प्र० को छोड़ कर दूसरे अन्य प्रदेशो की बात है !हमारे प्रदेश में तो कारखाना कारीगर बैठा देते है !अधिकतर लघु और बहुत छोटे उद्योग तो कारीगर की अकर्मणता और दांव पेंच में और मालिक को सताने के कारण यूनियन बाजी के कारण ही खत्म हो गये !हम जैसे लोग तो अब कभी भी ऐसा कोई आगे काम नही करना चाहेंगे ,जिसमे दूसरों केश्रम परनिर्भरता हो !मेरा अनुभव बहुत कड़वा है !और बहुत लम्बा भी !सादर !!

    jlsingh के द्वारा
    October 22, 2014

    आदरणीया रंजना जी, सादर अभिवादन! मनाता हूँ आपका अनुभव कटु है … पर बड़े कारखाने के ज्यादातर कारीगर मनोयोग से काम करते हैं और मानते हैं कि यही उनकी रोजी रोटी है. हाँ ये बात अलग है आज के भौतिकतावादी समाज में सभी चाहते हैं आगे निकल जाना या प्रतियोगिता में बने रहना. मैंने एक सामान्य मजदूर वर्ग का चित्रण किया है,जिसे मैंने भी महसूस किया है.

Ravinder kumar के द्वारा
October 19, 2014

सिंह साहब, सादर नमन . आपकी कविता मजदूर का सटीक चित्र खींचती है. “बिस्तर छोड़े होकर निर्गुण” एक मजदूर को नियंता के पद पर बैठाता है. श्रम मेव जयते के बीच यदि हम मजदूर का और उसके काम का सम्मान करने लगे तो वास्तव में श्रम की विजय होगी. अच्छी रचना के लिए आपको बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    October 22, 2014

    आदरणीय रविंदर जी, सादर अभिवादन! प्रथम एवं उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार!


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