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जाए तो जाए कहाँ

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जाये तो जाए कहाँ, समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की जुबाँ
कांग्रेस को मिली है सजा, सपने दिखा आयी भाजपा, कुछ दिन तो ढोल बजा.
जाए तो जाए कहाँ,
कहते थे, सुनते थे, अच्छे दिन, अब आएंगे, अब कहते, वो था जुमला
जाए तो जाए कहाँ,
झाड़ू पकड़ी, फावड़ा उठा, भाषण सुन ताली भी बजा, ‘ बैंक खाता’ भी खूब खुला
जाए तो जाए कहाँ,
लाख पंद्रह नही आएंगे, संचित धन, भी जायेंगे, ‘कर’ सेवा का भी है बढ़ा.
जाए तो जाए कहाँ,
भाजपा से मोह घटा, आम आदमी खोजे रास्ता, सौदागर, हर कोई हैं यहाँ
जाए तो जाए कहाँ,
टोपी पहन आया केजरी, मफलर भी बाँधा केजरी, खांसी से रहा वो परेशां
जाए तो जाए कहाँ,
आम आदमी समझा नहीं, धारा में बहा ‘मत’ भी, अब जाकर भेद खुला
जाए तो जाए कहाँ,
अपन करम, अपना धरम, करने में, नहीं हो शरम, कहिये सभी सच्ची जुबाँ
जाए तो जाए कहाँ,

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajanidurgesh के द्वारा
March 18, 2015

सिंघजी बहुत सम्यक.

    jlsingh के द्वारा
    March 20, 2015

    आभार आदरणीया रजनी दुर्गेश जी!

MANOJ SRIVASTAVA के द्वारा
March 17, 2015

सर, हक़ीक़त के बिलकुल करीब है आपकी रचना , सुन्दर शब्द विन्यास के लिए साधुवाद

    jlsingh के द्वारा
    March 20, 2015

    हार्दिक आभार आदरणीय मनोज श्रीवास्तव जी!


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