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यह शहर समय से चलता है

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मौसम चाहे हो कोई, यह शहर समय से चलता है,
सरकारें चाहे हो जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
शालाएं है श्रमिकों की, स्वच्छ, सुसज्जित लोग यहाँ,
पूस की रात या जेठ दुपहरी, नहीं ठहरते लोग यहाँ
घर आँगन में खुशियां झलके, वेतन जिस दिन मिलता है,
सरकारें चाहे हो जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
पांच बजे पोंगा बज जाता, सपने बुनते लोग जगें,
माताएं, घर की महिलाएं, टिफिन बनाने किचेन भगे.
बालिग जन संग बच्चे भी, होते हैं तैयार समय से,
बस चालक या वैन का चालक, आ जाते है ठीक समय पे
वर्क शॉप का गेट खुलेगा, समय का पहरा वहां लगे,
विद्यालय के गेट पे देखो, चौकी दार भी वहां खड़े.
चाय पान जलपान के ठेले, गेट के सम्मुख लगे खड़े,
समय की चिंता रहती सबको. समय की कीमत दिखता है
सरकारें चाहे हो जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
होली, ईद, दीवाली आती, गुरुपर्व और क्रिसमस भी,
टीसू पर्व भी यहाँ मनाते, छठ में नदियां भी सजतीं
खरकाई मिलती है जाकर सुवर्णरेखा की गोदी में,
दोनों की लहरें जब मिलती बूँदें सजती मोती में
बनी सुनहरी दो मुहानी भीड़ हमेशा वहां लगी,
भवनों से झांकते सभी जन मधुर मनोहर लगता है
सरकारें हो चाहे जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
जुबली या निक्को के पार्क हों, करते हैं सब भ्रमण यहाँ,
लेजर फांउंटेन यहाँ लुभाये, चिड़ियाघर भी सजग यहाँ,
प्रमोद पार्क में पलती प्रकृति, पुष्प कुञ्ज मन भावन हैं,
कचड़ा से कम्पोस्ट बनाते, हँसता हरदम सावन है
बना पहाड़ था अवशेषों का. कहलाता था वह मकदम.
जाकर देखो अभी वहां पर, फूल खिले रहते हरदम.
हुड़को पार्क की शोभा न्यारी, प्रकृति कितनी प्यारी है,
बड़े बड़े हैं पेड़ यहाँ पर, कहीं फूल की क्यारी है
बारिश का पानी न ठहरता, नालों नदियों में टिकता है
सूट बूट में चलो निकल लो, फर्क नहीं कुछ दिखता है
सरकारें चाहे हो जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
जुस्को सेवा देती निशिदिन, बिजली पानी सुलभ यहाँ,
पल भर में ही वे आ जाते, एक फोन जो सुने वहां
चिर गृह भी है सही सुरक्षित, नई इमारत क्या कहने,
बाहर के भी लोग यहाँ पर,रहें सुरक्षित क्या कहने !
अफसर हो या श्रमिक वर्ग हो, मिलनसार सब होते हैं,
दुःख सुख में सब एक साथ हैं, इक दूजे के होते हैं.
वन भोज का कर आयोजन, साथ अगर चाहें जिमना,
थोड़ी देर जाने में लगेगी, चले जाएँ सब संग डिमना
डिमना का भी डैम अजब है, पानी का भडार यहाँ,
मिनरल वाटर जैंसा पाचक, ऊंचे पर जल स्रोत यहाँ
धुंए उगलते कल कारखाने, बाग़ बगीचे सजे हुए ,
धूल-कणों के लिए मशीने, छाजन करती बिना थके
सड़कें सब हैं साफ़ सुरक्षित, सभी यहाँ अनुशासित हैं,
लाल रोशनी पर रुक जाते, हरे रंग पर चालित हैं
टाटा नाम से टाटा नगरी, जमशेद जमशेदपुर है,
तीन मार्च को नमन है उनको, सारे जन ही आतुर हैं
गौरव मुझको उतना ही है, कर्म भूमि यह मेरा है,
मेरे जैंसे अगणित जन हैं, सबका अपना डेरा है
भावों के भूखे हैं हम सब, प्यार में सबकुछ चलता है
सरकारें चाहे हो जिसकी, सिक्का टाटा का चलता है
जन्मोत्सव या शादी का भोज हो, समय बद्ध संचाल यहाँ,
ड्यूटी अपनी सबकी प्यारी, खाकर पहुंचे सभी वहां
एक से बढ़कर एक यहाँ पर, प्रतिभाएं संभ्रांतों में,
आई ए एस, आई पी एस छोड़ो, मुख्यमंत्री दो प्रांतों में .
धोनी का कीड़ा स्थल है, सौरभ जैसे लोग यहाँ
गांगुली हो या हो तिवारी, क्रिकेट खिलाड़ी कई यहाँ,
यहाँ बछेंद्री पाल हैं देखो, प्रेम लता अग्रवाल यहीं,
दीपिका तीर-धनुष के साथ है, साथ सुसज्जित पदक कई
तनुश्री हो या हो प्रियंका, फिल्मों में रंग दिखे हजार,
बच्चन पाठक सलिल सरीखे, जयनंदन से कहानीकार!
दो दो नेहा एक साथ में, बनती सरकारी अफसर,
किशन सरीखे पूत यहाँ के, होते शहीद हैं सीमा पर
माता रोती, बापू रोते, दिल सबका ही दुखता है …
पूरा शहर उमर कर आता आँखों में जल दिखता है
पूरा शहर उमर कर आता आँखों में जल दिखता है

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस.बिष्ट् के द्वारा
July 25, 2016

यह शहर समय से चलता है ” ……….खूबसूरत कविता । सुंदर, सटीक चित्रण ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 7, 2015

आपने अपनी कर्मभूमि का बहुत जीवंत और रोचक चित्रण किया है आदरणीय जवाहर सिंह जी ,ऐसा लगा जैसे टाटा नगरी की सैर कर रहे हों .सादर .

    jlsingh के द्वारा
    September 7, 2015

    हार्दिक आभार आदरणीया निर्मला जी!

yamunapathak के द्वारा
July 23, 2015

आदरणीय जवाहर जी बहुत अच्छी कविता है पर इस शहर को परसों नज़र लग गई ….जो अमन पसंद शहर था वहां कर्फु लगाना बहुत दुखद रहा साभार

    jlsingh के द्वारा
    July 25, 2015

    देश बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है. छोटी मोटी घटना भी हिंसक रूप लेती जा रही है हमारे जमशेदपुर जैसे अमन पसंद शहर में हिंसा और कर्फ्यू बहुत कष्टकारी रहा है ..पर क्या किया जाय कुछेक लोगों की छुद्र मानसिकता का खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ा …धीरे धीरे स्थिति सामान्य हो रही है…सादर!

आर एन शाही के द्वारा
July 19, 2015

भाई जी, बहुत ज़्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता, चाहे अपने सुन्दर शहर से ही क्यों ना हो । मैंने भी कभी आपके शहर से बेइंतहा प्यार किया था, लेकिन ऐसी ज़ुदाई हिस्से में आई है कि बस पूछिये मत । सपना बन कर रह गया जमशेदपुर पहुँचकर एक बार फिर वही जुबली पार्क में सुबहो शाम की सैर, साल में कम से कम एक बार डिमना की गोद में पिकनिक और दोमुहानी की तरफ नए मैरीन ड्राइव से होकर कभी कभी यूँ ही चक्कर लगा आना । आप को एक राज़ की बात बताता हूँ कि संजोग ही था जो मैं उस दिन साढ़े चार बजे पार्क में नहीं पहुँच पाया था, जिस दिन गजराज ने स्वर्णरेखा तैरकर पार करने के बाद ज़ू की तरफ से पार्क की मुख्य सड़क पर आकर एक वॉकर को कुचलकर  मार डाला था । उसके बाद से ही मैंने मुँहअंधेरे ज़ू की सफारी की ओर से रिंग रोड पर जॉगिंग करने की बजाय खुद को भीतरी फुटपाथ के दायरे तक समेट लिया था । जो भी हो, आपका शहर खूबसूरत भी है, और प्यार पाने के  लायक भी ।

    jlsingh के द्वारा
    July 21, 2015

    आदरणीय शाही साहब, सादर अभिवादन! यह शहर हम सबका है आपका भी है सर! याद तो आती है, आनी भी चाहिए. बस मैं अपने को सौभाग्यशाली ही समझता हूँ की मेरी जिंदगी स्वर्णिम काल यहाँ गुजरा है और गुजर रहा है आगे की तो ऊपर वाला जाने. बस जब भी जमशेदपुर की विशेष चर्चा खासकर जब भारत स्टार पर होने लगता है तो मैं अपने को रूक नहीं पाता और कुछ लिख ही देता हूँ. ..कभी कभी कुछ असामाजिक तत्व या गजराज (भूले भटके) शहर की शांति को भांग करता है अन्यथा ज्यादा समय तो लोग यहाँ अपने आप में ब्यस्त रहते हैं. जुबली पार्क में अभी भी काफी लोग प्रात: भ्रमण करते हैं. और बाकी आप जानते ही हैं. आपका बहुत बहुत आभार ऐसे ही दस्तक देते रहें …लगता है अपने अग्रज से भेंट हो गयी …अब जे जे पर बहुत काम लोग ही सक्रिय है और जे जे का तकनीकी प्रॉब्लम भी काफी दिन से चल रहा है जिसे ये लोग ठीक नहीं कर पा रहे हैं… एक बार पुन: प्रणाम!

deepak pande के द्वारा
July 18, 2015

waah aadarniya जवाहर जी एक ही कविता ने पूरे जमशेदपुर के दर्शन करा दिए यह कविता आपके tatanagar के प्यार को प्रदर्शित करती है

    jlsingh के द्वारा
    July 18, 2015

    जी आदरणीय दीपक पाण्डे जी, आप बिलकुल सही समझ रहे हैं …आखिर यह हमारी कर्मभूमि है… आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार!

sadgurji के द्वारा
July 17, 2015

आदरणीय सिंह साहब ! हार्दिक बधाई ! कविता भले ही साहित्यिक दृष्टि से बहुत उत्कृष्ट न हो, परन्तु इसमें टाटा के प्रति और श्रम व श्रमिकों के प्रति लगाव की बहुत भावभीनी खुशबू है ! अच्छी प्रस्तुति के लिए सादर आभार ! आपने इतनी तारीफ की है तो टाटा नगरी एक बार जरूर जा के देखना चाहिए ! वहां पर कई लोग परिचित के हैं ! सबसे बड़ी ख़ुशी आपसे भेंट कर होगी !

    jlsingh के द्वारा
    July 17, 2015

    जी आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आपका हार्दिक स्वागत है …अभीतक हमारे दो ब्लोगर मित्र (एक योगी सारस्वत जी और दूसरे राजेश कुमार श्रीवास्तव जी), मेरी कुटिया को अपनी चरणरज से पवित्र कर चुके हैं. आप अगर आयेंगे तो मेरा मान हे बढ़ाएंगे. आपका अंतर्मन से स्वागत है. मैंने कविता में अपने शहर से लगाव को व्यक्त किया है, सार यही है आप प्रभावित हुए यही मेरे लिए बड़ी बात है.सादर!

Shobha के द्वारा
July 16, 2015

बहुत सुंदर तुकबन्दी प्रतिक्रिया आप तक पहुंचेगी नहीं

    jlsingh के द्वारा
    July 17, 2015

    आजकल कॉमेंट स्पैम में चले जा रहे हैं … वहां से मुक्त करना होता है ….त्वरित प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी


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