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बाबा भीमराव अम्बेडकर की प्रासंगिकता

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पिछले कुछ दिनों या कहें तो गत सालों में बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर पर खूब चर्चा हुई। यूं तो भारतीय संविधान के निर्माता और दलितों के मसीहा को १९९० में ही भारतरत्न सम्मान से सम्मानित किया गया था। दलितों के नाम से बनी बहुजन समाजवादी पार्टी के आदर्श पुरुष तो हैं ही और भी दलितों के नाम से राजनीति करने वाली पार्टियाँ उनका नाम बड़े आदर के साथ लेती है। वर्तमान मोदी सरकार ने उनके सम्मान में दिसम्बर माह में १० रुपये और १२५ रुपये के सिक्के जारी किये। नवम्बर में संविधान दिवश के अवसर पर भी बाबा साहब पर जम कर चर्चा हुई और सभी पार्टियों ने उन्हें अपना आदर्श माना।
प्रधानमंत्री मोदी ने २१ फरवरी को भीमराव अंबेडकर नेशनल मेमोरियल का शिलान्यास किया। पीएम मोदी ने कहा, ‘मुझे बाबा साहेब के सपने पूरे करने का अवसर मिला है। वह हमें 1956 में छोड़ गए थे। 60 साल के बाद उनका मैमोरियल बनाया जा रहा है। मुझे पता नहीं हम इसके बारे में क्या कहेंगे, लेकिन 60 साल बीत गए। शायद यह काम मेरे नसीब में था। मैं इस उद्घाटन 14 अप्रैल 2018 में करूंगा।’ उन्हों।ने कहा- ‘मुझे याद है कि जब वाजपेयी जी की सरकार बनी तो चारों तरफ हो-हल्ला मचा कि ये भाजपा वाले आ गए हैं, अब आपका आरक्षण खत्म होगा।’ एमपी, गुजरात में कई सालों से बीजेपी राज कर रही है। महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा में हैं। हमें दो तिहाई बहुमत से अवसर मिला। लेकिन कभी भी दलित, पीड़ित के आरक्षण को खरोंच नहीं आने दी। फिर भी झूठ बोला जाता है।’ पीएम मोदी ने कहा कि बाबा साहब ने तो राष्ट्र निष्ठा की प्रेरणा दी थी, लेकिन कुछ लोग सिर्फ राजनीति चाहते हैं। उन्हों ने आगे कहा कि बाबा साहेब को दलितों का मसीहा बताकर अन्याय करते हैं। उन्हें सीमित न करें। वे हर वर्ग के शोषित, कुचले, दबे लोगों की आवाज बनते थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि बाबा साहेब को सीमाओं में न बांधे। उन्हें विश्व मानवीयता के रूप में देखें। दुनिया मार्टिन लूथर किंग को जिस तरह देखती है, उसी तरह हमारे लिए बाबा साहेब अंबेडकर हैं। पीएम ने कहा- ‘जिसका बचपन अन्याय, उपेक्षा, उत्पीड़न में बीता हो। जिसने अपनी मां को अपमानित होते देखा हो, मुझे बताइए वह मौका मिलते ही क्या करेगा? वह यही कहेगा कि तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम मुझे मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमिशन नहीं लेने देते थे।’

बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार सफ़ाई दे रहे है कि आरक्षण को कोई छीन नही सकता है लेकिन इन लोगों पर विश्वास नही किया जा सकता है। वास्तव में यह सब भी उसी प्रकार की जुमलेबाजी लगती है जैसा कि उन्होंने विदेशों से काला धन देश में वापस लाकर हर भारतीय के अकाउंट में 15-15 लाख डालकर उनके ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा किया था। अब उसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग आरक्षण की इस व्यवस्था में कमियां निकालकर इसकी समीक्षा की अनुचित जातिवादी बातें कर रहे हैं।सुश्री मायावती ने कहा कि इसमें आरएसएस और भाजपा की कट्टर हिन्दुत्ववादी विचारधारा साफ झलकती है। ऐसी मानसिकता वाले लोगों को दलितों और अन्य पिछडों से माफी मांगनी चाहिये। अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिये साम, दाम, दण्ड, भेद हथकण्डों को अपनाया जा रहा है। इन हथकण्डों में बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के नाम पर स्मारक और संग्रहालय आदि की घोषणा करके उन्हें अनेकों प्रकार से बरग़लाने का काम भी शामिल है।
बात यह है कि भाजपा की सहयोगी संगठन आरएसएस की तरफ से बयान आते हैं कि आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए, तभी प्रधान मंत्री को स्पष्टीकरण देना पड़ता है और दूसरी पार्टियाँ हो-हल्ला करती हैं। जैसे कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की आत्म हत्या के बाद से जो स्थिति बनी. मानव संशाधन विकास मंत्री को संसद में अपना बचाव करना पड़ा। JNU के कन्हैया कुमार भी रोहित वेमुला और बाबा साहब आंबेडकर को अपना आदर्श बता चुके हैं। प्रधान मंत्री को भी अपने भाषण में रोहित वेमुला का नाम लेते वक्त भावुकता का प्रदर्शन करना पड़ा. केजरीवाल और राहुल गांधी भी हमदर्दी जाता चुके हैं. सवाल यही है कि बाबा साहेब किनके किनके आदर्श पुरुष हैं अगर वे सबके लिए आदर्श हैं तो उनके द्वारा किये गए प्रयासों का प्रतिफल अभी तक क्या है? क्या अभी भी दलित सताए नहीं जा रहे हैं? उनके आरक्षण पर सवाल नहीं उठाये जा रहे हैं? मोहन भागवत ने कहा कि संपन्न लोगों को स्वेक्षा से आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिये। उनकी इस घोषणा के बाद एक नेता सिर्फ जीतन राम मांझी ने यह घोषणा की कि वे अब आरक्षण का कोई लाभ नही लेंगे। अच्छी बात है, अभी वे और उदित राज जी भाजपा के साथ हैं इसलिए भाजपा की पार्टी लाइन के साथ चल रहे हैं। कब ये अलग हटकर अपनी विचारधारा बदल लेंगे कहना मुश्किल है क्योंकि अभी उन्हें सभी सुविधाएँ प्राप्त है।

डॉ॰ भीमराव रामजी अंबेडकर (१४ अप्रैल १९९१- ६ दिसंबर १९५६) एक विश्व स्तर के विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ, भारतीय संवोधन के मुख्य शिल्पकार भी थे। वे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय हैं। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। एक अस्पृश्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुर्वर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। जो इस प्रकार है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। शूद्रों को उनसे उच्च वर्ग के लोग अत्यधिक कष्ट देते थे। बाबा साहब ने इस व्यवस्था को बदलने के लिए सारा जीवन संघर्ष किया। इस लिए उन्होंने बौद्ध धर्म को ग्रहण करके इसके समतावादी विचारों से समाज में समानता स्थापित कराई। उन्हें बौद्ध आन्दोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। चूँकि वे विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी के प्रेरणा स्रोत हैं, इस लिए उन्हें विश्व भूषण कहना ही उपयुक्त है।
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र वा राजनीति शास्त्र में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय आयर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ॰ आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है, हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा।
अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने परद कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था।
छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष – अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचन और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। यह संघर्ष आज भी जारी है।
तात्पर्य यही है कि जबतक दबे कुचले, अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक न्याय नहीं किया जाता, बाबा साहेब की प्रासंगिकता बनी रहेगी। – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 19, 2016

साप्ताहिक सम्मान के लिए fb पर तो पहले ही बधाई दी गई है , यहां भी स्वीकार करें !

    jlsingh के द्वारा
    April 20, 2016

    हार्दिक आभार आदरणीय गुंजन साहब!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 19, 2016

सुन्दर और सामयिक आलेख !

    jlsingh के द्वारा
    April 20, 2016

    बहुत बहुत आभार आदरणीय आचार्य गुंजन जी!

अभिषेक शुक्ल के द्वारा
April 9, 2016

आदरणीय सर! सदर प्रणाम, साप्ताहिक सम्मान की बहुत-बहुत बधाई. बहुत समसामयिक लिखा है अपने, आज कल कमोबेश हर राजनीतिक पार्टी केवल अवसर भुनाने में लगी है.कुछ भारतीय राजनीतिक के स्थापित चेहरों को अपने चुनावी मकसद के लिए भुनाने में सभी पार्टियां बेहतरीन काम कर रही है.बाबा साहब पर भी दलित राजनीती हावी है, उङ्के३ कृत्यों का लाभ सभी को चाहिए किन्तु उनके आदर्शों पर चलने वाला कोई नहीं है…..

    jlsingh के द्वारा
    April 9, 2016

    मैंने भी वही कहने की कोशिश की है प्रिय अभिषेक शुक्ल जी! आपकी प्रतिक्रिया संतुलित और परिमार्जित है. काश की हम सभी और राजनीतिक पार्टियां ऐतिहासिक महापुरुषों के पदचिह्नों पर चलने का प्रयास करती.

OM DIKSHIT के द्वारा
April 9, 2016

आदरणीय जवाहर जी, बेस्ट ब्लॉग के लिए बधाई !

    jlsingh के द्वारा
    April 9, 2016

    हार्दिक आभार आदरणीय ओम दीक्षित जी!

ashasahay के द्वारा
April 8, 2016

सम्मान के लिए बहुत बधाई।इस देश मेंअम्बेदकर की प्रसंगिकता सदैव बनी रहेगी।विश्लेषनात्मक लेख बहुतही अच्छा है।

    jlsingh के द्वारा
    April 9, 2016

    उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीया आशा सहाय जी!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 8, 2016

साप्ताहिक सम्मान के लिए आपको बहुत बहुत बधाई । इस लेख को पढने का पहले ही सौभाग्य प्राप्र्त हो गया था । अच्छा सारगर्भित लेख लिखा है आपने । इस महत्वपूर्ण लेखन के लिए आप बधाई के पात्र हैं और यह जागरण सम्मान तो बनता ही है ।

    jlsingh के द्वारा
    April 9, 2016

    आदरणीय एल एस बिष्ट साहब, सादर अभिवादन ! आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार!

Dr S Shankar Singh के द्वारा
April 8, 2016

डा बाबा साहिब भींमराव आंबेडकर ने देश में में एकता स्थापित करने के लिए बहुत ही काम किया. हिन्दू समाज जैसे विभाजित समाज में न्याय स्थापित करने के लिए, गैर बराबरी समाप्त करने के लिए बाबा साहेब अविस्मरणीय रहेंगे. जबतक समाज में गैर बराबरी है आरक्षण समाप्त नहीं किया जा सकता. एक संतुलित लेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई. बेस्ट ब्लॉगर सम्मान के लिए भी बहुत बहुत बधाइयां.

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय शंकर सिंह साहब, सादर अभिवादन! आपके द्वारा दी गयी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. सादर!

jlsingh के द्वारा
April 7, 2016

सर्वप्रथम मैं जागरण टीम का आभार व्यक्त करता हूँ, जिसने मेरे इस आलेख को साप्ताहिक सम्मान से नवाजा है. साथ ही मैं अपने सभी पाठकों, वरिष्ठ और कनिष्ठ शुभचिंतकों का भी आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने समय-समय पर उचित सलाह और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया देकर मेरी लेखनी को सुधारने का प्रयास किया है. सादर!

Shobha के द्वारा
April 7, 2016

श्री जवाहर जी मैने पहले ही आपको 100 में से 100 नंबर दे दिए थे लेख बैस्ट था |

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीया शोभा जी, आपका हार्दिक अभिननदन! १०० में १०० गणित में कभी-कभी मिल जाता था. साहित्य या समाज शास्त्र में ऐसा बड़ा मुश्किल होता है. आपके उत्साहवर्धन से लिखने की प्रेरणा मिलती है. आपका अतिशय आभार!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 7, 2016

बहुत सुन्दर ..विश्लेषणात्मक .सारगर्भित आलेख अच्छी तुलनाएं भी दी हैं अच्छी और संजोने लायक जानकारी जो अच्छा है उसे सदा अच्छा कहना ही हमारा धर्म और कर्म होना चाहिए बाबा भीम राव अम्बेडकर के प्रयास को बल देना होगा समाज संतुलित होगा तभी शांति होगी और सचमुच विकास होगा . ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की हार्दिक बधाई भ्रमर ५

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! आपने हमेशा हमारा समर्थन किया है, इसके लिए हार्दिक आभार. समाज का संतुलित और समुचित विकास जरूरी है तभी समृद्धि और शांति आएगी. पर नेतागण और हमारे कर्णधारों को भी आगे आना होगा. केवल बातों से तो किसी का पेट नहीं भरता, बल्कि गैर जरूरी बातों से विवाद ही उत्पन्न होते हैं. आज वही ज्यादा हो रहा है. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
April 7, 2016

साप्ताहिक सम्मान के लिए हार्दिक बधाई जवाहर जी । आपका लेख तथ्यपरक होने के साथ-साथ पॉलीटिकली करेक्ट भी है क्योंकि आज का युग तो अंबेडकर के महिमामंडन का ही युग है । चुनाव के बाज़ार में बिकने वाला ब्रांड बन गए हैं वे । उनकी आलोचना करने के लिए तथा उनसे संबंधित नकारात्मक तथ्यों को उजागर करने के लिए बड़ा साहस चाहिए जो अंतिम बार अरुण शौरी जी ने दिखाया था, अब कोई दिखा सकने वाला नहीं । कोई दिखाएगा तो उनके उग्र भक्त उसे जीने नहीं देंगे । वे प्रासंगिक हैं लेकिन उनके नाम की रोटियां तोड़ने वाले उनके चेले-चपाटे अनवरत तथा असीमित आरक्षण एवं  तथाकथित सवर्ण जातियों की वर्तमान पीढ़ी के निर्दोष सदस्यों के प्रति प्रतिशोधात्मक दृष्टिकोण में ही उनकी प्रासंगिकता देखते हैं, अन्य किसी रूप में नहीं । निस्संदेह वे दलितों के मसीहा थे और हैं लेकिन आज जो हो रहा है, वह वे नहीं चाहते थे । आपने समाचार-पत्रों में पढ़ा होगा कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पूर्व ही खम ठोककर घोषणा की थी कि आज स्वयं अंबेडकर भी आ जाएं तो वे भी आरक्षण को समाप्त नहीं करवा सकते । क्या आप उनके इस वक्तव्य के मर्म को भाँप सकते हैं ? 

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय जितेन्द्र माथुर जी, सादर अभिवादन! मोदी जी की बातें बहुआयामी होती हैं. वे बातों को मोड़ना, घुमाना अच्छी तरह से जानते हैं. आज आरक्षण के अंतर्गत इतना बड़ा वोट बैंक है कि सत्ता में रहनेवाली या विरोधी पार्टियां कभी भी आरक्षण जैसे हथियार को अपने हाथ से जाने नहीं देंगी. बीच बीच में जो आवाजें उठती हैं वह भी मेरी समझ से तुष्टिकरण जैसी ही लगती है. ताकि सवर्ण अपने आपको उपेक्षित न समझे. या भाजपा अब उनके साथ अन्याय कर रही है, ऐसा सन्देश न जाय! इसीलिये कभी-कभी आरक्षण पर पुनर्विचार की बात कह दी जाती है और उधर हरियाणा को तबाह करनेवाली जाट-समुदाय को आरक्षण के अंदर शामिल कर लिया जाता है. बहुत कठिन है आर्कषण को हटाना, और उससे भी कठिन है सही लोगों/यानी जरूरत मंद लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुँचाना. आपने विस्तृत और सारगर्भित प्रतिक्रिया दी है उसके लिए आपका ह्रदय से सम्मान करता हूँ.

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    बहुत कठिन है आरक्षण को हटाना, और उससे भी कठिन है सही लोगों/यानी जरूरत मंद लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुँचाना. कृपया संशोधित कर पढ़ें नीचे मैंने आरक्षण को ‘आर्कषण’ लिख दिया है. टाइपिंग मिस्टेक …सादर!

ranjanagupta के द्वारा
April 7, 2016

आदरणीय जवाहर जी  ..बहुत बहुत बधाई ..आपको  बेस्ट ब्लागर बनने की … आपके लेखो में जो धार  है.. जो आंच  है   वो मै सदैव अनुभूत  करती  हूँ …आपकी लेखनी की प्रासंगिकता सदैव देदीप्यमान है …

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीया रंजना जी, सादर अभिवादन! आप जैसी विदुषी के उदगार मेरे लिए प्रेरणास्रोत का काम करते हैं. आपका आशीर्वाद मेरे साथ है . आगे भी रहेगा, यही कामना करता हूँ. सादर!

sadguruji के द्वारा
April 7, 2016

आदरणीय सिंह साहब ! सुप्रभात ! सादर हरि स्मरण ! साप्ताहिक सम्मान ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की हार्दिक बधाई ! समाज के दबे कुचले और अस्पृश्यों के प्रति अन्याय और शोषण की जो समस्या आपने उठाई है, ये तब तक रहेगी जबतक कि देश में जातिवाद हावी है ! इस समस्या का समाधान वस्तुतः धर्मगुरुओं खासकर शंकराचार्यों के पास है, किन्तु वो तो जातिवाद का फायदा और आनंद लेने में मग्न है ! वो कुछ नहीं करने वाले ! एक छोटे से प्रयास के रूप में अपने आश्रम में जातिवाद ख़त्म कर दिया है ! पिछले चौबीस सालों में जातिगत भेदभाव करने वाले कई लोंगो को निष्कासित किया गया ! सब धार्मिक संस्थाएं और धर्मगुरु ऐसा ही करें तो दलितों का और हिन्दू समाज का कुछ भला हो !

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय सद्गुरु जी, सादर हरिस्मरण! आपके कई लेखों के माध्यम से पता चलता है कि आप जातिवाद और जातिगत भेदभाव के खिलाफ हैं. मेरे स्वर्गीय अग्रज भी रामाश्रम सत्संग संस्था से जुड़े थे, उनके साथ मैं भी कभी-कभी सत्संग में जाता था. वहां भी जाति गत भेदभाव नहीं था. सभी एक साथ बैठकर सत्संग भी करते थे और एक साथ बैठकर सामान्य भोजन करते थे. कुछ संस्थाएं हैं जो इन प्रयासों में लगी हैं पर अधिकांश धार्मिक संगठन या तो जातिगत भेदभाव से ग्रसित हैं या फिर राजनीतिक लाभ लेने के लिए राजनेताओं के संपर्क में रहते हैं. आप सही कह रहे हैं कि सब धार्मिक संस्थाएं और धर्मगुरु ऐसा ही करें तो दलितों का और हिन्दू समाज का कुछ भला हो ! पर प्रश्न बड़ा है कि यह भार लेनेवाला कौन हैं. सभी तो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं. बीच बीच में विष वमन कर और घृणा का माहौल उत्पन्न करते रहते हैं.खैर कभी न कभी तो परिवर्त्तन होगा या फिर भयंकर क्रांति से सब कुछ ख़त्म न हो जाए. बुद्धिजीवियों , नेताओं और समाज सुधारकों को सतत प्रयास करने की जरूरत है. आपके उत्साहवर्धन का हार्दिक आभार!

sunita dohare Management Editor के द्वारा
April 5, 2016

आदरणीय सादर प्रणाम ……………… अगर आंकलन किया जाये तो सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि समाज का संभ्रात वर्ग आदिवासी समाज को सहजता से स्वीकार करता है लेकिन दलित जातियों को स्वीकारने में भयानक कतराता है। दलितों में भी हरिजन उसके लिए सबसे ज्यादा अस्वीकार्य? क्यों? क्यूंकि देश का अधिकांश उच्च वर्ग बात बात में गालियां भी देता है तो उसी तरह की जो इन जातियों के बारे में होती है और इनकी सामाजिक और सांस्कृतिक अनुपयोगिता पर होती है। जैसे सभ्यता के सभी सूत्र उसके पास है और वह जो चाहता है वही होता है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के विचार इसी घटिया समाजशास्त्र को चुनौती देते हैं। आज भी हमारे समाज में धार्मिक और जातिगत गैरबराबरी बदस्तूर जारी है  और इसी गैरबराबरी को हटाने के लिए बाबा साहेब अपनी अंतिम साँस तक अनवरत लड़ते रहे, उनका ये संदेश आज़ादी के दौरान जितना प्रासंगिक लगता था, आज उससे कहीं ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है l ………. 

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीया सुनीता दोहरे जी, सादर अभिवादन! आप सही कह रही हैं. आज भी हमारे समाज में धार्मिक और जातिगत गैरबराबरी बदस्तूर जारी है और इसी गैरबराबरी को हटाने के लिए बाबा साहेब अपनी अंतिम साँस तक अनवरत लड़ते रहे, उनका ये संदेश आज़ादी के दौरान जितना प्रासंगिक लगता था, आज उससे कहीं ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है l

sunita dohare Management Editor के द्वारा
April 5, 2016

आदरणीय सादर प्रणाम ……………… अगर आंकलन किया जाये तो सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि समाज का संभ्रात वर्ग आदिवासी समाज को सहजता से स्वीकार करता है लेकिन दलित जातियों को स्वीकारने में भयानक कतराता है। दलितों में भी हरिजन उसके लिए सबसे ज्यादा अस्वीकार्य? क्यों? वह बात बात में गालियां भी देता है तो उसी तरह की जो इन जातियों के बारे में होती है और इनकी सामाजिक और सांस्कृतिक अनुपयोगिता पर होती है। जैसे सभ्यता के सभी सूत्र उसके पास है और वह जो चाहता है वही होता है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के विचार इसी घटिया समाजशास्त्र को चुनौती देते हैं। आज भी हमारे समाज में धार्मिक और जातिगत गैरबराबरी बदस्तूर जारी है  और इसी गैरबराबरी को हटाने के लिए बाबा साहेब अपनी अंतिम साँस तक अनवरत लड़ते रहे, उनका ये संदेश आज़ादी के दौरान जितना प्रासंगिक लगता था, आज उससे कहीं ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है l ………. 

    jlsingh के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीया सुनीता दोहरे जी, सादर अभिवादन! आपने बहुत ही सारगर्भित बातें कही है. अभी हमारे समाज को बदलने में समय लगेगा. कुछ तो बदला ही है. शिक्षा और सभ्यता के विकास से परिवर्तन आया है पर यह अभी समुचित नहीं कहा जा सकता है. थोड़ा और बदलाव हम सबके अंदर आना चाहिए और शिक्षा का प्रसार दलितों, हरिजनों के बीच होना चाहिए ताकि उनके जीवन, रहन-सहन में बदलाव आए. अम्बेडकर जैसे लोगों की अभी भी जरूरत है. मोदी जी की सोच तो सही लगती है पर उनके कई अनुयायी बीच-बीच में बढ़ा उत्पन्न करते रहते हैं. मोदी जी को इन सब बाधाओं को पार करते हुए आगे निकलना है. आपकी विस्तृत प्रतिक्रीया का हार्दिक आभार!

sadguruji के द्वारा
April 1, 2016

“जबतक दबे कुचले, अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक न्याय नहीं किया जाता, बाबा साहेब की प्रासंगिकता बनी रहेगी !” आदरणीय सिंह साहब ! बिलकुल सही कहा है आपने ! लेख बहुत सार्थक और विचारणीय है ! भगवत जी की बातें मेरी समझ से बाहर हैं ! जो कहते हैं, उसे कुछ दिन बाद उलट देते हैं ! अपने भ्रमित करने वाले बयानों से उन्होंने बीजेपी को बहुत नुकसान पहुंचाया है ! सादर आभार !

    jlsingh के द्वारा
    April 7, 2016

    आदरणीय सद्गुरु जी सादर हरिस्मरण ! आप सही कह रहे हैं, मोहन भागवत जी क्यों ऐसा करते हैं. अभी हाल ही में उन्होंने कहा की भारत मत की जय सबको बोलना चाहिए फिर पलटी मार गए कि जबर्दश्ती नहीं कि जानी चाहिए… हालाँकि सही ही कह रहे हैं, जबर्दश्ती तो आप किसी पर देश भक्ति क्या, कोई भी चीज थोप नहीं सकते क्योंकि आज समय बहुत बदल गया है सभी के अपने व्यक्तिगत विचार और भाव हैं. कानून कि नजर में सब बराबर हैं, पर कानून तोड़नेवाले भी जानते हैं कि कानून का वे कितना सम्मान कर रहे हैं. आपकी सार्थक प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार!

Rajesh Dubey के द्वारा
March 31, 2016

सत्ता प्राप्ति के कई तंत्र में एक तंत्र दलित भी हैं. जैसे हनुमान जी के नाम से भुत-प्रेत भाग जाते है, उसी तरह दलित और बाबा अम्बेडकर के नाम पर सत्ता प्राप्त किया जा सकता है. यह सही है कि आज भी आम दलितों को वह सुविधा नहीं मिली है जो सुविधा खास दलितों के पास है. खास दलित भी आम दलित कि उपेक्षा करते है. उनकी उच्च वर्ग कि पत्निया और बच्चे आज भी अछूत ही मानते हैं.

    jlsingh के द्वारा
    April 1, 2016

    आदरणीय राजेश दुबे जी, सदर अभिवादन! आप से पूरी तरह सहमत हूँ. आज जो सभी नेता या दल जो बाबा साहेब का नाम जप रहे हैं वे सत्ता प्राप्ति या सत्ता में बने रहने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं. आपका यह भी कहना सही है कि राम विलास पासवान, उदित राज, मायावती जैसे नेता कायदे से ख़ास दलितों ने अपना और अपने परिवार के भले के बारे में ज्यादा सोचा है. वे अपने समाज, और पिछड़ी/दलित जातियों के बारे में, उनके उत्थान के बारे में बहुत ज्यादा नहीं कर पाए हैं. आज जरूरत उसी की है कि दबे कुचले लोगों को कैसे ऊपर लाया जाय. सर्वप्रथम तो उन्हें शिक्षित किया जाय और थोड़ी प्राथमिकता/सुविधा दी जाय ताकि वे एक आम आदमी का जीवन तो जी सकें. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 31, 2016

जबतक दबे कुचले, अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक न्याय नहीं किया जाता, बाबा साहेब की प्रासंगिकता बनी रहेगी।………………यही सच है । बहुत महत्वपूर्ण लेख । 

    jlsingh के द्वारा
    April 1, 2016

    आदरणीय एल एस बिष्ट साहब, सादर अभिवादन! समर्थन के लिए हार्दिक आभार!

Shobha के द्वारा
March 31, 2016

श्री जवाहर जी स्वर्गीय अम्बेडकर पर लिखा लेख पढ़ कर कितनी प्रशंसा करूं कम है | मुझे आकाश वाणी में वार्ता के लिए बुलाया जाता है एक बार अम्बेडकर जी पर आज का विचार लिखना था मैं दिल्ली की साहित्यिक लायब्रेरी में गयी उन पर लिखी सभी किताबें निकाल क्र पढने लगी जितना पढ़ती जाती उतना डूबती जाती परन्तु मैं इतनी अच्छी वार्ता इतना पढ़ क्र भी नहीं लिख सकी जितना आपने आधुनिक सन्दर्भ में लिखा है| कई बार हैरानी होती हैं बेहतरीन लेखक ब्लॉग में लिखते हैं लेकिन अखबार में लिखे लेख काम चलाऊ होते हैं केवल एक ही बात को घुमा देते हैं सम्पूर्ण लेख और समीक्षा |संविधान ही देखिये कम्प्लीट संविधान है| बहुत अच्छा लेख

    jlsingh के द्वारा
    March 31, 2016

    आदरणीया शोभा जी, सादर अभिवादन! जब आप जैसी पंडिता, विदुषी से उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिलती है तो मैं अपने आपको धन्य समझता हूँ. सच कहिये आदरणीया तो मैंने लिखना इसी मंच से सीखा. बहुत सारे पुराने ब्लोगर जो अब सक्रिय नहीं हैं, उन्होंने ही मुझे लिखना सिखाया. बहुत बार सुधार/सुझाव देकर मुझे प्रोत्साहित करते रहे. अगर मुझसे कहीं गलती होती है, तो उन गलतियों की तरफ भी अवश्य ध्यानाकृष्ट करावें सादर अभिनन्दन आपका .

ranjanagupta के द्वारा
March 30, 2016

बालक अम्बेडकर ने वही त्रासदी झेली .. जो तुलसीराम ने झेली …अपनी दलित व्यथा उन्होंने’मुर्दहिया ”और ‘मणिकर्णिका ‘ में व्यक्त की है …बधाई .. जवाहर  जी…..

    jlsingh के द्वारा
    March 31, 2016

    आदरणीया रंजना गुप्ता जी, सादर अभिवादन! मेरा ज्ञान वर्धन करने के लिए हार्दिक आभार!

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
March 30, 2016

जवाहर जी उत्तम लेख ,बधाइ ,भीमराव जी दलित नहीं थे वे ब्राह्मणत्व प चुके थे और दलितों को ब्राह्मणत्व की और लाना चाहते थे | समाज मैं सभी को ब्राह्मणत्व की और लाना ही उनका उद्देश्य था | इसीलिये उनकी कोई काट नहीं थी न होगी ओम शांति शांति

    jlsingh के द्वारा
    March 31, 2016

    जी आदरणीय हरिश्चंद्र जी, आज के दलितों और दलितों के कथित नेताओं को उनसे सीख लेने की है जरूरत, बल्कि कहें तो हम सबको उनके आचरण से सीख लेने की है जरूरत. बिना विद्या तो मनुष्य पशु समान ही है . आपके स्नेहिल प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार!


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