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प्रधान मंत्री का छ: दिवसीय विदेश दौरा

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वैसे तो प्रधान मंत्री मोदी का हर काम ऐतिहासिक रहा है। उनकी शैली, उनका आचरण, उनका वक्तव्य, उनका सन्देश सब कुछ अनूठा होता है । सबको यही लगता है कि ऐसा शायद पहली बार हुआ है। वे ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं। प्रधान मंत्री के इस दौरे को ‘तूफानी दौरा’ कहा गया। पांच देशों में अनेकों बैठकों, सभाओं में भाग लिया। सबका दिल जीत लिया। इशारों-इशारों में आतंकवादी पड़ोसी के भी ऐसी की तैसी कर दी। खासकर अमेरिका में सांसदों के सामने जो सशक्त भाषण उन्होंने दिया, उसका गवाह है वहां के सांसदों का बार बार ताली बजाना और सम्मान में खड़े होकर आभार व्यक्त करना।
प्रधानमंत्री के ताजा विदेशी दौरों की समीक्षा करने में मीडिया भी बड़ी उलझन में दिखा। वैसे तो दूसरे देशों से संबंध के मामले में सभी देशों के आम लोग एकमत से स्वार्थी हो जाते हैं। वे यही देखते हैं कि दूसरे देश से हमें क्या फायदा मिलने वाला है। पता नहीं किस काल में ऐसा होता होगा कि दूसरे देशों से संबंध बनाने या बढ़ाने के मामले में दो देश एक दूसरे के फायदे की बात सोचते होंगे। इतिहास तो यही बताता है कि हमेशा से ही अच्छी कूटनीति यही मानी जाती रही है कि कोई कितनी चतुराई से किसी देश से ज्यादा से ज्यादा लेकर आए और कम से कम देकर आए। आइए इसी नजरिए से देखें कि प्रधानमंत्री अमेरिका से क्या लेकर आए और क्या देकर आए।
हमारे अपने मीडिया ने यही बताया है कि हम परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(NSG) की सदस्यता को और पक्का करके आए हैं। दूसरा फायदा यह कि मिसाइल प्राद्योगिकी को विकसित देशों से पाने में जो अड़चनें थीं वह अमेरिकी दौरे में कम करके आए हैं। तीसरा यह कि अमेरिकी जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी शान बढ़ाकर आए हैं। भारतीय मीडिया ने प्रधानमंत्री के दौरे के पहले जो एजेंडा प्रचारित किया था वह भी यही था सो दौरे के बाद यह धारणा बनना स्वाभाविक ही था कि अपने देश ने कमाल कर दिया। प्रधानमंत्री के वापस लौट आने के कम से कम दो दिन बाद तक तो यही स्थिति बनी हुई है।
सबकी तरह अमेरिकी मीडिया भी अपने देश के प्रति देशभक्ति क्यों नहीं दिखाएगा। खासतौर पर तब जब दुनिया के तमाम बड़े देशों की तरह अमेरिका भी मंदी की मार से दिन पर दिन दुबला हुआ जा रहा हो और उनके सामने दूसरे देशों को अपना सामान बेचने का सबसे बड़ा लक्ष्य हो। अमेरिकी मीडिया ने अपने जागरूक पाठकों के लिए, अपने देश के हितों को सबसे ऊपर रखते हुए और तीन करोड़ भारतीय मूल के अमेरिकियों की स्वाभाविक प्रसन्नता के लिए भारतीय प्रधानमंत्री के दौरे को कमतर करके नहीं दिखाया। दौरे से एक हफ्ते पहले यानी 27 मई को और दौरे से ऐन पहले 5 जून के न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टों को गौर से देखेंगे तो एक बात यह भी पाएंगे कि प्रधानमंत्री के पिछले 15 साल के इतिहास और सत्ता में आने के दो साल के काम-काज का जिक भी इस अखबार ने किया था। ओबामा और मोदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि और अल्पसंख्यक मामले में राजनीतिक सोच की भिन्नता तक का जिक्र अमेरिकी मीडिया में किस मकसद से आया होगा यह बात ऊंचे किस्म के राजनयिक ही बता पाएंगे।

अमेरिका आधुनिक विश्व के सफलतम व्यापारी के रूप में सर्वमान्य है। इस समय भी उसका रुतबा दुनिया के सबसे मालदार देशों जैसा है। वह सामान भी वही बनाकर बेचता है जो ऊंची लागत और ऊंचे मुनाफे वाले यानी बेशकीमती होते हैं। और ज्यादातर वही सामान बनाता है जो विकासशील देशों को बेचे जा सकें। लिहाजा अमेरिकी मीडिया की नजरों में भारतीय प्रधानमंत्री का अमेरिका दौरा एक ऐसे बड़े ग्राहक का दौरा समझा जा सकता है जिसके बारे में वह समझता है कि भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। अमेरिकी मीडिया के रुख को गौर से देखें तो उसने तीन बातों को तवज्जो दी। एक भारत को एटमी बिजली घर जल्दी बेचे जा सकें। दूसरी यह कि मिसाइल प्रौद्योगिकी बेची जा सके। और तीसरी कि सौर ऊर्जा का आधुनिक सामान बेचा जा सके। रही बात इसकी कि इनसे संबंधित सौदों के आकार को इस बार सार्वजनिक नहीं किया गया। कहने को ये बातें रक्षा संबंधी गोपनीयता वाली कही जाती हैं। लेकिन इस सौदे के भारी भरकम आकार के कारण भी हो सकता है कि इसे सार्वजनिक करने से बचा गया हो।
मीडिया में जिक्र एटमी बिजली घरों के सौदे का ज्यादा नहीं हुआ। इस काम को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के लिए भारत का समर्थन करने के नाम पर प्रचारित किया गया। उसी तरह मिसाइल प्रौद्योगिकी को बेचने का जिक्र नहीं हुआ बल्कि संबंधित व्यवस्था में भारत को शामिल करने में अमेरिकी समर्थन का हुआ। सौर ऊर्जा का सामान बेचने का जिक्र नहीं हुआ बल्कि इस बात को जलवायु संधि पर भारत की रजामंदी की दिशा में आगे बढ़ने का हुआ। धरती को ठंडा रखने के लिए स्वच्छ ऊर्जा या हरित ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन के लिए भारत पर अच्छा खास दबाव है। हमारी दिक्कत यह है कि हम इस पर भारी भरकम खर्च की माली हैसियत में नहीं हैं।
फौरन ही समझ में नहीं आया था कि अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान आठ बार देर तक ताली बजाने का चक्कर क्या है? गौर से देखने से पता चला कि प्रधानमंत्री के भाषण में ये वे मौके थे जो संकेत देते थे कि भारत अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को राजी है। अमेरिकी जनप्रतिनिधि विश्व में इस भयावह मंदी के दौर में यह सुनकर गदगद क्यों नहीं होंगे कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला और 130 करोड़ आबादी वाला भारत आज मुश्किल समय में अमेरिका के साथ है, सिर्फ साथ ही नहीं है बल्कि अमेरिका का बेस्ट फ्रेंड है।
ये तो सबको भनक लगने देने की बात नहीं है कि हम खुद किस स्थिति में है। हालांकि इस मुगालते में रहने से भी अब कोई फायदा नहीं है कि किसी को पता नहीं है। मसलन न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत की मौजूदा सरकार के वायदों और उस पर अमल की बात भी प्रधानमंत्री के इसी अमेरिकी दौरे के पहले लिखी थी। खैर कुछ भी हो, इस बार हम बराबरी के लेन-देन की बात सोच सकते थे। मसलन मेक इन इंडिया के लिए सीधे ओबामा के जरिए जिक्र छिड़वा सकते थे। पता नहीं क्यों इस बार अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय और दूसरे अमेरिकी निवेशकों से भारत मैं पैसा लगाने, भारत में बेरोजगारी मिटाने की बातें सुनाई नहीं दीं। शायद हम एनएसजी की संभावित सदस्यता से ही अपने को गदगद मुद्रा में दिखाना चाहते थे।
वैसे अमरीका के सांसदों का शिष्टाचार अपनी जगह है जो वे ताली बजाकर और खड़े होकर जाहिर करते हैं, और करना भी चाहिए घर आए महत्त्वपूर्ण मेहमान का. मनमोहन सिंह और बाजपेयी जी का भी स्वागत ऐसे ही हुआ था. जैसा की अन्य लोग चर्चा कर रहे हैं. अमेरिका हमारा स्वाभाविक मित्र है नेहरू के ज़माने से. इंदिरा गांधी के समय हमारा झुकाव रूस की तरफ हुआ था. अब रूस की हैसियत पतली है फिर भी वह हमारा साथी ही है.
रही बात आतंकवादी पकिस्तान की, तो यह समय ही बताएगा कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का क्या रुख रहता है और पाकिस्तान अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाता है या नहीं? मौजूदा राज्य सभा के चुनाव में भाजपा ने बाजी मारी है और अब वह राज्य सभा में पहले की अपेक्षा बेहतर स्थिति में है। आगे कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर आदि राज्यों में विधान सभा के चुनवा हैं और यहाँ के लिए प्रधान मंत्री श्री मोदी के साथ भाजपा रणनीति बनाने में लग गयी है। इन राज्यों में भाजपा कैसा प्रदर्शन करती है यह तो वक्त ही बताएगा पर जमीन से जुड़े लोगों के हक़ में परिणाम आने चाहिए। - जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
June 19, 2016

श्री जवाहर जी विस्तार से लिखा गया अच्छे निष्कर्ष “गौर से देखने से पता चला कि प्रधानमंत्री के भाषण में ये वे मौके थे जो संकेत देते थे कि भारत अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को राजी है। अमेरिकी जनप्रतिनिधि विश्व में इस भयावह मंदी के दौर में यह सुनकर गदगद क्यों नहीं होंगे कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला और 130 करोड़ आबादी वाला भारत आज मुश्किल समय में अमेरिका के साथ है, “जब रशिया मजबूत था नेहरु जी ने तटस्थता की निति अपनाई थी इंदिरा जी मजबूत नेता थे अमेरिका की विदेश नीति उनको कम पसंद करती थी उन्होंने बंगलादेश बनाया था वः अमेरिकी जहाजी बेड़े से भी नहीं डरी थी सौ बात की एक बात “आतंकवादी पकिस्तान की, तो यह समय ही बताएगा कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का क्या रुख रहता है और पाकिस्तान अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाता है या नहीं? ” बाकी तो मीठी बातें हैं

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2016

    जैसा की खबरों में देखा है अमेरिका ने पाकिस्तान को ८० करोड़ डॉलर की मदद दे रहा है और NSG की सदस्य्ता भी अमरीकी सीनेट से ख़ारिज हो गयी है तो क्या फलाफल हुए यह तो विशेषज्ञ ही बता सकते हैं. हमारा देश शांति पूर्वक ढंग चले और हमरे लोग खुशहाल रहें यही तो हम सभी चाहते हैं. बाकी बातें तो …सबल सहायक सबल के… और हम आँख मिलकर ही बात करेंगे. जैसा की प्रधान मंत्री ने कहा है. सादर!

harirawat के द्वारा
June 17, 2016

जवाहर लाल बेटे, काफी दिनों बाद ब्लॉग में आने का अवसर मिला ! इस समय मैं अमेरिका में हूँ ! सफर की तैयारी में वक्त ही नहीं मिला ! मोदी जी की ५ देशों की महत्वपूर्ण यात्रा के बारे में विस्तृत लेख पढ़ा, बहुत सारी जानकारियों से रूबरू हुआ, ऐसे सविस्तार और सम्पूर्ण जानकारी के लिए आशीर्वाद ! जागते रहो !

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2016

    आदरणीय चाचा जी, आपका अमेरिका प्रवास सुखमय हो इसकी कामना करता हूँ. दूर देश में रहकर भी आप अपने देश और हमारे जैसे लोगो से जुड़े रहते हैं यह काम बड़ी बात नहीं है. आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है. सादर!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 15, 2016

सार्थक आलेख जवाहर भाई अच्छी चीजों का ऐसे ही समर्थन होना चाहिए बाकी तो गेम है ही हमारी खातिर सब दूसरे देशों से नाते तो तोड़ेंगे नहीं उनकी अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता होगी और कहीं मजबूरी भी हम जितना कुछ झोली में ला सकते हैं लाते रहें विकसित हों तन मन सब से तो आनंद और आये … इतिहास तो यही बताता है कि हमेशा से ही अच्छी कूटनीति यही मानी जाती रही है कि कोई कितनी चतुराई से किसी देश से ज्यादा से ज्यादा लेकर आए और कम से कम देकर आए।..यही फार्मूला अन्य भी तो पढ़े होंगे न … भ्रमर ५

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2016

    आपने बिलकुल सही कहा आदरणीया, सभी देशों के अपनी अपनी कूटनीति होती है. सभी अपना फायदा देखते हैं. हम भी यही चाहते हैं. सफलता किसे कितनी हाथ लगती यह तो समय बताएगा. वैसे सीनेट का फैसला और पाकिस्तान को सहायता से भी कुछ इशारा मिल ही गया है…. सादर!

    jlsingh के द्वारा
    June 19, 2016

    आपने बिलकुल सही कहा आदरणीय भ्रमर जी, सभी देशों के अपनी अपनी कूटनीति होती है. सभी अपना फायदा देखते हैं. हम भी यही चाहते हैं. सफलता किसे कितनी हाथ लगती यह तो समय बताएगा. वैसे सीनेट का फैसला और पाकिस्तान को सहायता से भी कुछ इशारा मिल ही गया है…. सादर!


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