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ढोल गंवार शूद्र पशु नारी

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ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी. गोस्वामी तुलसीदास ने बहुत पहले ही कह दिया था. रामायण में भी जगज्जननी सीता की अग्नि परीक्षा के बाद भी धोबी के द्वारा लांछना देने पर राजमहल से निर्वासित कर जंगल में भेज दिया गया, वह भी गर्भावस्था में. अहिल्या प्रकरण से भी हम सभी परिचित हैं. द्रौपदी के साथ क्या हुआ, हम सभी वाकिफ हैं. पुराणों के समय से महिलाओं और शूद्रों की अवहेलना होती रही है. इतिहास में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है. इतिहास में भी महिलाओं के साथ बहुत भद्रता से पेश नहीं आया गया. सती प्रथा उन्मूलन, विधवा विवाह प्रारंभ और बाल विवाह उन्मूलन आदि कार्यक्रम महिलाओं की ख़राब स्थिति को देखते हुए ही चलाये किये गए. काफी वेश्याएं मजबूरीवश ही यह पेशा अपनाती हैं. कोठे पर जानेवाले तो शरीफ और खानदानी होते हैं. पर वेश्याओं को कभी भी अच्छी नजर से नहीं देखा गया. कमोबेश आज भी स्थिति वही है.
हालांकि पहले भी और आज भी महिलाएं सम्मान और सम्मानजनक पद भी पा चुकी है. पहले भी देवियाँ थी और आज भी वे पूज्य हैं. आज भी अनेकों महिलाएं कई सम्मानजनक पद को सुशोभित कर चुकी हैं. प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्य मंत्री से लेकर कई पार्टियों की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. इसके अलावा कई जिम्मेदार पदों पर रहकर अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन का रही हैं. प्रधान मंत्री रह चुकी इंदिरा गाँधी को विश्व की ताकतवर हस्तियों में गणना की जाती रही है. पर लांछन लगानेवाले उनके भी चरित्रहनन से बाज नहीं आये. सोनिया गाँधी पर भी खूब प्रहार किये गए. एक दिवंगत भाजपा नेता ने उनकी तुलना मोनिका लेवेस्की से कर दी थी. वर्तमान सरकार के मुखर मंत्री भी सोनिया गाँधी पर अमर्यादित टिप्पणी कर चुके हैं. महिला हैं, यह सब सुनना/सहना पड़ेगा. महिलाओं, वृद्धाओं, बच्चियों के साथ हो रहे घृणित कर्मों से समाचार पत्र भरे रहते हैं. निर्भया योजना, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ, बेटी पढाओ आदि योजनाओं के होते हुए भी महिलाओं पर ज्यादती हो रही है और कब तक होती रहेगी कहना मुश्किल है. भाजपा की वर्तमान सरकार की पूर्व मानव संशाधन विकास मंत्री (वर्तमान कपड़ा मंत्री) पर भी बीच-बीच में फब्तियां कसी जाती रही हैं. हालाँकि वे स्वयम मुखर हैं और वे अपना बचाव करती रही हैं.
वर्तमान सन्दर्भ है, मायावाती को भाजपा के उत्तर प्रदेश के पार्टी उपाध्यक्ष श्री दया शंकर सिंह ने उन्हें सार्वजनिक सभा में वेश्या कहा. मायावती ने इसका पुरजोर विरोध किया. संसद में खूब दहाड़ी और अपने कार्यकर्ताओं को भी एक तरह से ललकार दिया कि वे सड़कों पर उतर आयें और विरोध प्रदर्शन करें. हालाँकि दयाशंकर सिंह ने माफी मांग ली पर उनपर कई धाराएं लगाकर प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी है. उन्हें गिरफ्तार करने के लिए यु पी पुलिस ढूंढ रही है, पर वे तो अंडरग्राउंड हो गए. हालाँकि एक प्रेस को उन्होंने साक्षात्कार भी इसी बीच दे दिया है और फिर से माफी मांग ली है और यह भी कहा है कि उनकी गलती की सजा उनकी पत्नी और बेटी को क्यों दी जा रही है? उल्लेखनीय है कि मायावती की शह पाकर बसपा कार्यकर्ताओं की भीड़ ने दयाशंकर की पत्नी और उनकी १२ वर्षीय बेटी को भी अपमान जनक शब्दों से नवाजा. दयाशंकर की बेटी सदमे में हैं और उनकी पत्नी स्वाति सिंह उत्तेजित. उन्होंने मायावती और उनके कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा चुकी हैं. धरने पर बैठने की तैयारी में थी, पर शायद बेटी की तबीयत ज्यादा ख़राब हो गयी इसलिए फिलहाल धरने का कार्यक्रम टाल दिया है. पर मीडिया में वह भी मायावती पर खूब हमला कर रही है. स्वाति जी सुशिक्षित, LLB और पूर्व लेक्चरर भी हैं भाजपा प्रदेश के उपाद्ध्यक्ष की पत्नी हैं. इसलिए मायावती पर वह भी जमकर प्रहार कर रही हैं. उनका आक्रोश भी खूब झलक रहा है. वह मायावती और उनके कार्यकर्ताओं पर हमलावर हैं, पर अपने पति के द्वारा प्रयुक्त शब्द पर उनका जवाब रक्षात्मक ही है. कुछ लोग उनमें राजनीतिक नेत्री की छवि भीं देख रहे हैं. क्योंकि दयाशंकर के पार्टी से ६ साल के निष्कासन पर उनकी जगह वही भर सकती हैं और एक खास वर्ग के वोटों की हकदार हो सकती हैं.
रविवार, २४ जुलाई को मायावती का प्रेस कांफ्रेंस हुआ उसमें मायावती ने भाजपा पर जमकर प्रहार किया साथ ही दयाशंकर की माँ, बहन और पत्नी को भी दोहरी मानसिकता की शिकार बताया. जबकि बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी का बचाव करती नजर आयीं. मायावती के अनुसार नसीमुदीन ने कोई गलत शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. वे तो दयाशंकर को पेश करने की मांग कर रहे थे. गुजरात के ऊना में दलितों के साथ हुए प्रताड़ना का मुद्दा भी उठाया. रोहित वेमुला केस को भी उन्होंने कुरेदा और यह अहसास करवाया कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है. बसपा एक राजनीतिक पार्टी के साथ एक सामाजिक परिवर्तन की भी पैरोकार है. मायावती ने सपा और भाजपा की मिलीभगत की तरफ भी इशारा किया. क्योंकि अब तक दयाशंकर की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई है? इस मामले में प्रधान मंत्री की चुप्पी भी विपक्ष को प्रश्न उठाने का मौका दे देता है.
जाहिर है मामला राजनीतिक है और इसे दोनों पार्टियाँ अपने-अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने कहा कि मायावती खुद दलित विरोधी हैं और उन्हें चुनाव के समय ही दलितों की याद आती है. भाजपा भी दलितों के घर खाना खाकर, बाबा साहेब अम्बेडकर की १२५ जयंती के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रम करके बसपा के वोट बैंक दलित समाज में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं. अब तो चुनाव परिणाम ही बताएगा कि दलित वोट किधर जाता है?
उधर आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुतल्ला खान को एक महिला की साथ बदसलूकी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. ख़बरों के अनुसार अबतक आम आदमी पार्टी के नौवें विधायक गिरफ्तार हो चुके हैं. शाम तक आम आदमी पार्टी के एक और विधायक नरेश यादव को भी पंजाब में विद्वेष फ़ैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी पर कानून का शिकंजा शख्ती से लागू होता है. पर भाजपा के पदाधिकारी को पुलिस ढूढ़ ही नहीं पाती है. एक और बिहार भाजपा के पार्षद(एमएलसी) टुन्ना पाण्डेय पर किसी १२ वर्षीय लड़की के साथ ट्रेन में छेड़छाड़ का आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. उसे भी भाजपा ने तत्काल पार्टी से निलंबित कर दिया. इससे यह जाहिर होता है कि भाजपा फिलहाल अपनी छवि को बेदाग रखना चाहती है.
अब थोड़ी चर्चा मानसून की कर ली जाय. इस साल पहले से ही अच्छे मानसून की भविष्यवाणी की जा रही थी. मानसून अच्छी हो भी रही है. कहीं-कहीं खासकर उत्तर भारत में अतिबृष्टि हो रही है. अतिबृष्टि से जान-माल का भी काफी नुकसान हो रहा है. बिहार झाड़खंड में देर से ही सही पर अभी अच्छी वर्षा हो रही है. खरीफ की अच्छी पैदावार की उम्मीद की जा सकती है. पर वर्तमान में दाल और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, इस पर सरकार का कोई खास नियंत्रण नहीं है. सब्जियों और खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण और रख-रखाव के मामले में भी अभी बहुत कुछ करना बाकी है. किसानों को उनकी लागत के अनुसार दाम नहीं मिलते, इसलिए वे खेती-बारी की पेशा से दूर होते जा रहे हैं. उपजाऊ जमीन या तो बेकार हैं या वहाँ अब ऊंचे ऊंचे महल बन गए हैं. गाँव में भी शहर बसाये जा रहे हैं. विकास के दौर में कृषि का अपेक्षित विकास नहीं हो रहा है. भारत गांवों का देश है, अभी भी लगभग ७० प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है. कृषि और कृषि आधारित उनका पेशा है पर वे गरीब हैं. ऋण ग्रस्त हैं. इसलिए वे असंतोष की आग में आत्महत्या करने को भी मजबूर हैं. सच कहा जाय तो दलित और पिछड़ा वही हैं. कब मिलेगी उन्हें इस दलितपने और निर्धनपने से आजादी! पूरे देश को खाना खिलानेवाला वर्ग आज स्वयम भूखा नंगा है. खोखले वादों से तो कुछ भला नहीं होनेवाला. जमीनी स्तर पर काम होने चाहिए. सामाजिक समरसता और समान वितरण प्रणाली से ही सबका भला होगा. तभी होगा जय भारत और भारत माता की जय!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
July 29, 2016

एक से अधिक विषयों को एक साथ लेकर आलेख की रचना करना आपकी लेखन-शैली का अंग है जवाहर जी, ऐसा मुझे प्रतीत होता है । बहरहाल, मैं आपके द्वारा स्पर्शित दोनों ही विषयों पर आपके विचारों से पूर्णरूपेण सहमत हूँ । आपने जो लिखा है, वह ठोस तथ्यों पर आधारित है और पूर्णतः निष्पक्ष है । साधुवाद और अभिनंदन ।

    jlsingh के द्वारा
    July 29, 2016

    बहुत बहुत आभार आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, कोशिश ही करता हूँ कि निष्पक्ष लिखूँ. एक लेखक का यही धर्म होता है. फिर भी कहीं अगर त्रुटि हो तो आप जैसे गुणीजन अवश्य राह दिखाएँ यही आशा करता हूँ. आपकी प्रतिक्रिया से लिखने का उत्साह बढ़ता है. सादर!

sadguruji के द्वारा
July 28, 2016

आदरणीय सिंह साहब ! अच्छे लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन ! कई विषयों पर आपने पठनीय और विचारणीय चर्चा की है ! दयाशंकर सिंह का मुद्दा तो अगड़े-पिछड़े की लड़ाई में बदल दिया गया ! अब भाजपा और बसपा दोनों की सेनाएं पीछे हैट रही हैं ! वाह ! भारत में क्या खूब शतरंजी राजनीति है ! हार्दिक आभार !

    jlsingh के द्वारा
    July 29, 2016

    आदरणीय सद्गुरु जी, सादर हरिस्मरण! राजनीति की बिसात बिच चुकी है, सभी अपने अपने पासे चलने लगे हैं. निर्णायक तो जनता ही होगी . जनता को अपनी तरफ साधने की कोशिश हो रही है. उत्तर प्रदेश में भी जातीय खेल जम कर चलेगा. अब जीत चाहे जिसके हो जनता का काम हो तो अच्छा है. सादर!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 27, 2016

श्री जवाहर जी अपशब्दों की राजनीति पर आपने काफी विस्तार से लिखा है । जो हो रहा है वह भी दिख रहा है । दर-असल यह सब दलित वोटों की छीना झपटी का दुष्परिणाम है । गहराई से देखें तो इसमे वोट को अपने पक्ष मे करने की पुरजोर कोशिश मायावती जी दवारा की जा रही है और क्यों न करे भाजपा के ही महाश्य ने उन्हें यह अवसर दिया है । फिलहाल तो लडाई का स्वरूप अब बदलता नजर आ रहा है । भाजपा जो बैकफुट पर थी अब आक्रामक नजर आ रही है । देखिए ऊंट किस करवट बैठता है ।

    jlsingh के द्वारा
    July 29, 2016

    आदरणीय बिष्ट साहब, सादर अभिवादन! जितना मैं समझाता हूँ, उसके अनुसार बिहार और यु पी में वोट जातीय समीकरण के अनुसार ही पड़ते हैं. सभी राजनीतिक पार्टियां जातीय समीकरण को साधने में लगे हैं. मुद्दा चाहे जो भी हो. हमलोग तो देखने वाले ही हैं, सरकार जिसकी भी बने काम जनता के हित में हो तो अच्छा है. सादर!

Shobha के द्वारा
July 26, 2016

श्री जवाहर जी जब भी अखंड रामायण के पाठ में हमने हम चार बहनें हैं मेरी तीन बहने सस्वर रामायण का पाठ अति सुंदर करती हैं मैं उनके पीछे केवल ताली बजाती हूँ हाँ आगे यह चौपाई आई है हम कुछ देर तक चुप हो कर विरोध करते हैं\कुछ ने हमारे विरोध प्रदर्शन पर लेख भी लिखे हमारा विरोध जारी रहा आप समझ जायेंगे तुलसी दस जी ने राम चरित्र मानस की जब रचना की मुगल काल था इस्लामिक कानून देश पर लागू था इस्लामिक कानून में महिला के लिए प्रताड़ित करना पुरुष का अधिकार माना जाता है पकिस्तान में तो बकायदा कानूनी मान्यता दी है रहा शुद्र उनका भगवान राम ने शबरी जन जाती की थी के जूठे बेर खाए शूद्र वेद पाठी था उनका प्रसंग शायद उत्तर काण्ड में आता है उसका विरोध हुआ था यह भी उचित नहीं था \. लेकिन तुलसी दास भगवती सीता और मन्दोदरी का जिक्र आदर से करते हैं बहुत अच्छा प्रश्न उठाता लेख

    jlsingh के द्वारा
    July 26, 2016

    आदरणीया शोभा जी, सादर अभिवादन! पूर्ण विनम्रता के साथ मैं अपना पक्ष रख रहा हूँ. रामचरित मानस में तुलसी दस ने शुरुआत में ही कहा है- पूजिये विप्र शील गन हीना, शूद्र न गुण गण ज्ञान प्रवीणा. वर्ष ऋतू के वर्णन में अति बृष्टि चली फ़ूट कियारी, जिमि सुतंत्र भये बिगरही नारी. …और भी नारी सुभाउ सत्य सब कहहीं, अवगुन आठ सदा उर रहहीं.. हाँ कथाकार लोग इन पंक्तियों की अलग अलग व्याख्या करते हैं. यह भी सही है की उस समय के अनुसार हो सकता है यह बातें सही हों.. आज भी गलियां जो पुरुषों द्वरा प्रयुक्त होती हैं उसमे गली तो स्त्री जाती को ही दे जाती है… मेरा तर्क वही था.. हाँ यह अलग बात है आज गलियों अपशब्दों, प्रताड़नाओं का अलग अलग ढंग से राजनीतिक लाभ लिए जाने का प्रचलन चल पड़ा है. आपकी उच्च कोटि की प्रतिक्रिया का हम हमेशा स्वागत करते हैं.

rameshagarwal के द्वारा
July 25, 2016

जय श्री राम आदरणीय जवाहर जी बहुत दिनों के बाद आपका लेख लिखा आपने कई लेखो को एक में मिला दिया.दलित समाज का एक अंग थे और वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी जबतक गुरुकुल शिक्षा देश में प्रचारित थी कोइ भेद भाव नहीं था सब एक जगह पढ़ते थे दलितो के साथ नफरत विदेशी आक्रमण के बाद हुआ और अंग्रेजो ने फूट डालो राजनीती अपना कर इसको और हवा दी.दलितों के साथ घटना स्वतंत्रता के बाद भी हो रही और उनकी और किसानो की दश के लिए मोदीजी को दोष देना गलत हट वे ७० साल की गंदगी साफ़ कर रहे लेकिन मीडिया में केवल बजो शासन की दलित उत्पीडन की खबरे देते और वोटो के भूके नेता इन जगहों को तीर्थ बना लेते मीडियादुसरे प्रदेशो की घटनाओं पर कोइ आंसू बहाने नहीं जाता.बीजेपी अपने नेताओ के खिलाफ कार्यवाही करती जबकि अन्य दल नहीं और मीडिया इस पर भी चुप.ऍआपके लेख में प्रितिक्रियाये देने में एक लेख हो जाएगा आपको इस सुन्दर लेख के लिए साधुवाद.

    jlsingh के द्वारा
    July 26, 2016

    आदरणीय अग्रवाल साहब, जय श्रीराम! आप सही कह रहे हैं, मीडिया हर मुद्दे को टूल देती है छै पक्ष का हो या विपक्ष का उसे भी अपनी TRP बढ़ानी रहती है क्योंकि इन ख़बरों को लोग चाव से देखते हैं. राजनीतिक लोग हर चीज में अपना फायदा देखकर ही मुंडी घुँसाते हैं, जनता को समझदारी दिखलाने की जरूरत है और ऐसे लोगों को सबक भी सिखलाने की जरूरत है, पर आप तो जानते ही हैं, भेड़चाल! और ज्यादा मैं आपको क्या समझ सकता हूँ, अपनी समझ के अनुसार और मीडिया में जो ख़बरें आती हैं उसी पर अपनी राय रखता हूँ. आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से ही लिखने को मन होता है. सादर!


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