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गर अभी समझ न पाएंगे

Posted On: 29 Jul, 2016 social issues,कविता में

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सूरज खुद जलता जाता है, धरती को अधिक तपाता है,
जब सूख गए सब नदी ताल, मानव, खग, पशु होते बेहाल,
जल के भापों का कर संचन, नभ में बदल हो गए सघन
काले बादल होते भारी, कर लिए पवन से जब यारी
बूँदों के भार न सह पाये, वर्षा बन वसुधा पर आये.
प्रकृति की गति भी न्यारी है, उसकी अपनी तैयारी है.
हम नहीं समझ जब पाते हैं, संतुलन बिगाडे जाते हैं.
कटते जाते जब वन जंगल, चिंता के साथ में आता कल.
भीषण वर्षा के तेज धार, नदियां उफनाई ले के ज्वार.
टूटे कितने ही शिला खंड, हिमगिरि भी होते खंड खंड.
बारिश विपदा बन कर आई, घर घर में जलधारा लाई.
खेतों में अब न फसल होंगे, घर में अनाज न फल होंगे.
बह गए अनेक ईमारत कब, करते है लोग इबादत अब.
हे ईश्वर अब तो दया कर दो, जीवन की भी रक्षा कर दो.
सैनिक बन आये देवदूत, रक्षा करते ये पराभूत !.
सैनिक जब सीमा पर होते, सीमा की वे रक्षा करते.
पर विपदा चाहे हो जैसी, ये करते मदद विधाता सी.
हे मानव अब भी ले तू सीख, या मांगोगे जीवन की भीख.
करके उपयोग जरूरत भर, संचित कर ले अंजुल भरकर,
जीने का हक़ सबको ही है, पशु, खग, जन, जड़,वन को भी है.
जल, वायु, जीव, वसुधा अरु वन, बनाते समरस पर्यावरण
गर अभी समझ न पाएंगे, कल को हम ही पछताएंगे.
गर अभी समझ न पाएंगे, कल को हम ही पछताएंगे.
जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 20, 2016

वाह बहुत खूब ,ज्यादा तर राजनैतिक विषयों पर आपकी लेखनी का जौहर देखा है पर प्रकृति के स्वभाव का एसा सिलसिलेवार सुंदर चित्रण काव्य में पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया ,यूँ ही लिखते रहिये आदरणीय जवाहर सिंह जी ,सादर शुभ कामनाएं .

harirawat के द्वारा
August 6, 2016

मेरे प्रिय भतीजे जवाहर, जैसा नाम ठीक वैसे ही प्रभु से पाया मेरे भतीजे ने साहित्य रूपी इनाम ! साहित्य जगत में तुम्हारा नाम नामी गरामी लेखकों में आता है, और दिल की कोमलता दिल से निकले कविता के सजीव शब्द अलंकार और रस में घुलमिल कर, कुदरत के प्रति की गयी ज्यादती , स्वयं बयां कर रही है ! मेरी अगली कविता भी पढ़ लेना, समानता का जलता दीप नजर आएगा ! बहुत सुन्दर कविता है, बहुत सारी शुभ कामनाओं के साथ ! चाचा

    jlsingh के द्वारा
    August 7, 2016

    आदरणीय चाचा जी, सादर चरण स्पर्श! आप बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद और मार्गदर्शन मेरे साथ है, ईश्वर की असीम अनुकम्पा तो है ही. आपका बहुत बहुत आभार!

Shobha के द्वारा
August 6, 2016

श्री जवाहर जी पहले सूखे का काव्यात्मक भाषा में वर्णन फिर उफनती नदियों का वर्णन और बहुत कुछ टूटे कितने ही शिला खंड, हिमगिरि भी होते खंड खंड. बारिश विपदा बन कर आई, घर घर में जलधारा लाई.अति सुंदर

    jlsingh के द्वारा
    August 6, 2016

    उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय डॉ. शोभा जी!

rameshagarwal के द्वारा
July 29, 2016

जय श्री राम आदरणीय जवाहर जी पर्यावरण बाढ़ और सेना के जवानों के प्रति कृतज्ञता भावपूर्ण कविता के द्वारा प्रस्तुत की बहुत सुन्दर रचना जिसकी प्रशंसा के लिए शब्द नहीं टीवी में देख कर बाढ़  की तबाही देख कर दिल दहल जाता जब न बरसे तो सुखा जब ज्यादा तब बाढ़ .प्रकारी से खिलवाड़ का जवाब प्रकति देती है पर्यावरण के बारे में ऋग वेड में बहुत दिया लेकिन सुख सुविधा में हम लोग प्रकर्ति के नियम भूल गए अभी भी न समले तो बर्बादी निश्चित है.इस सुन्दर रचना के लिए आभार.

    jlsingh के द्वारा
    July 29, 2016

    जय श्री राम आदरणीय अग्रवाल साहब, टी वी पर दृश्य देखकर ही इस कविता का जन्म हुआ समझिये. अभी कुछ ही दिनों पहले गर्मी से लोग परेशां थे, पीने का पानी के लिए बेहाल थे …और अब इतनी बारिश की हर तरफ तबाही.. सर अभी बहुत कुछ करना बाकी है. बढ़ के पानी या वर्ष जल का सही प्रबंधन कर पाने में हम पीछे हैं. आज ही सिंगापूर के बारे में टी वी में ही दिखा जो बहुत कुछ सिखला देता है. हमें सीखने और और अच्छी चीजों के अनुकरण में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
July 29, 2016

बहुत सुंदर और भावपूर्ण कविता जवाहर जी । हृदयस्पर्शी और प्रेरक ! आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । आपकी लेखनी का जादू जैसा गद्य में है, वैसा ही पद्य में भी है । असाधारण हैं आप, इसमें कोई संदेह नहीं । इस मंच के माध्यम से आपसे जुड़ जाने पर मुझे गर्व है ।

    jlsingh के द्वारा
    July 29, 2016

    आदरणीय जीतेन्द्र माथुर जी, सादर अभिवादन! मैं आपके सुरुचिपूर्ण प्रतिक्रिया से आह्लादित तो होता ही हूँ, आपसे स्नेह बढ़ता जाता है. बहुतों जगह आपके हमारे विचार मिलते हैं. मुझे भी आप से जुड़कर गर्व ही होता है. कुछ सम्बन्ध ऐसे ही होते हैं …यह जागरण का मंच अनूठा है, यहाँ बहुत सारे लोग आपस में जुड़े फिर बिछुड़े, फिर लौटकर कभी कभी झांक लेते हैं. लिखने की इच्छा तो विदयार्थी जीवन से ही थी. पर जागरण एक ऐसा मंच मिला जहाँ लोगों ने मुझे हाथों हाथ लिया और लिखना भी सिखाया. मैं सभी वरिष्ठों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे तराशा है …आप मेरे लिए उर्वरक, उत्प्रेरक का काम करते हैं आपका बहुत बहुत आभार!


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