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कुछ 'मुक्तक' आँखों पर

Posted On: 28 Aug, 2016 कविता में

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अँखियों में अँखियाँ डूब गईं,
अँखियों में बातें खूब हुईं.
जो कह न सके थे अब तक वो,
दिल की ही बातें खूब हुईं.

*
हमने न कभी कुछ चाहा था,
दुख हो, कब हमने चाहा था,
सुख में हम रंजिश होते थे,
दुख में तो ज्यादा चाहा था.

*
ऑंखें दर्पण सी होती हैं,
अन्दर बाहर सी होती हैं.
जब आँख मिली है तब से ही,
बातें अमृत सी होती हैं.

*
आँखों में सपने होते हैं,
अपने से सपने होते हैं,
आँखों में डूब जरा देखो,
कितने गम अपने होते हैं?

*
जब रिश्ते रिसते थे हरदम,
आँखों से कटते थे हरदम,
आँखों में कष्ट हुए थे जब,
आँसू बन रिसते थे हरदम.

*
लीला प्रभु की भी न्यारी है,
आँखों की छवि भी प्यारी है,
बढ़ता जाता है प्रेम तभी,
आँखें फेरन की बारी है.

जो ऑंखें झील समंदर थी,
सब छुरी कटारी अंदर थी,
क्षण एक नहीं अब होंगे जुदा
ये बात हमारे अंदर थी.

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
September 5, 2016

श्री जवाहर जी अति सुंदर भाव भरी पंक्तियाँ | एक बार एक मुशायरा सुनने का मौका मिला आँखों पर ही लिखा था नायिका की आँखें इतनी हसीन है कभी पलक मत झपकाना सारे जहां में अन्धेरा छा जाएगा लोग तालियाँ बजा रहे थे मेरी समझ में आँख न झपकने की वजह से वह सभी कौम्प्लिकेष्ण आ रहे थे जो आँख न झपकाने की वजह से आ सकते थे लेकिन यहाँ तो आँखों के महत्व को आपने समझाया है आँखों में सपने होते हैं, अपने से सपने होते हैं, आँखों में डूब जरा देखो, कितने गम अपने होते हैं? अति सुंदर

    jlsingh के द्वारा
    September 6, 2016

    बहुत बहुत आभार आदरणीया डॉ. शोभा भरद्वाज जी! आप सर्वगुण संपन्न और बहुमुखी प्रतिभा से युक्त हैं. आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए मायने रखती है, सादर!

achyutamkeshvam के द्वारा
September 5, 2016

बहुत खूब ….वाह क्या बात है .

    jlsingh के द्वारा
    September 6, 2016

    हार्दिक आभार आदरणीय अच्युत केशवम जी!

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 4, 2016

शबनम कभी शोला कभी तुफान हैं आॅखें ।आॅखों से बडी कोइ तराजु नहीं होती ।जवाहर जी आॅखो भूल चुके कवियों को एक यादगार अहसास ओम शांति शांति ।

    jlsingh के द्वारा
    September 6, 2016

    उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय हरिश्चन्द्र साहब!

Jitendra Mathur के द्वारा
August 31, 2016

बहुत सुंदर कविता जवाहर जी । अभिनंदन । आँखों की तो महिमा ही न्यारी है । हर तरह के जज़्बात का ऐलान हैं आँखें, शबनम कभी शोला कभी तूफ़ान हैं आँखें, आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती, तुलता है बशर जिसमें वो मीज़ान हैं आँखें ।

    J L Singh के द्वारा
    September 2, 2016

    आदरणीय श्री जितेंद्र माथुर जी, पिछले दिनों मैं या कहें की अभी भी आँखों के परेशानी से ग्रस्त था तभी इस कविता का जन्म हुआ था. अब देखता हूँ इसकी लाइनें बढ़ती जा रही है. शबनम कभी शोला कभी तूफ़ान होती है, यही तो देश की रक्षा को निगहबान होती है, ऑंखें ही तो होती है उत्तम तराजू, ये आँखें ही हर मानव की पहचान होती है. जयहिंद!

Rajesh Dubey के द्वारा
August 29, 2016

आखों की अपनी अलग दुनिया है. कभी झील कभी कटार, कभी समंदर कभी दर्पण. आपने भी इसे खूब सजाया है, वधाई, सुंदर कविता.

    jlsingh के द्वारा
    August 31, 2016

    आदरणीय राजेश दुबे जी, सादर अभिवादन आपने कुछ उपमा और जोड़ दिए हैं. आँखों पर बहुत कुछ लिखा गया है अनुभव किया गया है मैंने भी बस प्रयास किया आपके उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार! जो ऑंखें झील समंदर थी, अब फिर से बनी कटारी है क्षण एक नहीं जुदा होंगे अब तो जाने की बारी है. सादर!

rameshagarwal के द्वारा
August 28, 2016

जय श्री राम आदरणीय जवाहर जी क्या कविता लिखी आँखों के ओप्पर बहुत सारे काम आँखों ही आँखों में इशारे हो गए किसी फिल्म के गाने में सुना था.वैसे जिसे आँखों की भाषा आ जाती बहुत कुछ आपस में सन्देश दिया जा सकता आंके प्यार के साथ दुःख खुशी सबका अहसास का माध्यम बहुत सुन्दर कविता मंमोहने वाली.

    jlsingh के द्वारा
    August 31, 2016

    आदरणीय अग्रवाल साहब, सादर प्रणाम! यह कविता मेरी खुद की अनुभूति का परिणाम है.बस ऐसे मन में ख्याल आया और पंक्तिबद्ध कर दिया आपकी सुखद प्रतिक्रिया से मन को सदन्तोष हुआ सादर!


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