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मिहनत से जो घबराए, रहता है अक्सर निर्धन!

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क्या लेकर आए थे यहाँ पर, क्या लेकर तुम जाओगे,
जो कुछ है वो मिला यहीं से, यहीं छोड़कर जाओगे.
आज की चिंता अभी करो तुम, कल को कल पर ही छोड़ो
नदियाँ जो विपरीत दिशा में. उनकी धारा को मोड़ो
रह जाता जो खड़ा किनारे, डूबने से घबराता है,
रुका हुआ जैसे कोई राही, मंजिल कहाँ से पाता है.
शेर सपूत चुनते हैं राहें, रस्ता अपने आप बने
शायर शब्द सजाता जाता, कविता अपने आप बने
दुर्गम होते कई रास्ते, ठोकर लगती है पल पल,
पाहन तोड़ के राह बनाते, समझो उसी के हाथ में कल.
धरती माता जननी सबकी, वीर सपूत तनय उसके,
सस्य श्यामला पुलकित धरती, पूत सपूत अभय उसके
कर्मों का फल मिलना तय है, अपना कर्म करो मन से
फल देते हैं पौधे अक्सर, उर्वर भूमि पर सिंचन से.
मिहनत का फल मीठा होता, कहते आये हैं गुरुजन
मिहनत से जो घबराए, रहता है अक्सर निर्धन!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
September 18, 2016

श्री जवाहर जी आपने ठीक लिखा है परन्तु गीता के अनुसार कर्म करो लेकिन फल मेरे हाथ में है |लेकिन फिर भी कर्म से इन्सान अपनी तकदीर बदल लेता है

    jlsingh के द्वारा
    September 19, 2016

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, आपने सही कहा है, मैंने भी गीता के मूल मन्त्र से ही अपनी कविता की शुरुआत की है. कर्म प्रधान है यह भी हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
September 17, 2016

प्रशंसनीय एवं प्रेरणादायी कविता है यह जवाहर जी आपकी । हार्दिक अभिनंदन ।

    jlsingh के द्वारा
    September 17, 2016

    प्रशंसा और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय जितेंद्र माथुर जी!

rameshagarwal के द्वारा
September 16, 2016

जय श्री राम आदरणीय जवाहर जी बहुत अच्छा सन्देश कविता के माध्यम से दिया किसी को भी उन्नति के लिए हिम्मत से काम लेना पढता कभी कभी समय लग जाता लेकिन सफलता जरूर मिलती यही सन्देश भगवान् कृष्णा ने गीता में भी दिया.अच्छी कविता..

    jlsingh के द्वारा
    September 17, 2016

    आदरणीय अग्रवाल साहब, सादर अभिवादन और जय श्री राम! दरअसल गीता के मूल मन्त्र से ही मैंने कविता शुरू की और कुछ आगे की पंक्तियाँ बनती गयी. आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार!


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