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हिंदी गौरव (हिंदी दिवश पर विशेष)

Posted On 14 Sep, 2016 Hindi Sahitya, Junction Forum, Special Days में

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हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा भी है. यह संस्कृत, उर्दू, पाली, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, कोंकणी, अंगेजी एवं अन्य आंचलिक भाषाओँ की मिश्रित भाषा है. अगर इसे संस्कृत के तत्सम शब्दों के ही रूप में प्रयोग किया जाय तो यह सर्वमान्य नहीं हो सकती, बल्कि काफी लोगों के लिए दुरूह हो जायेगी. कई राज्यों ने इसे शासकीय भाषा के रूप में अपनाया है, पर उनके अनुवाद इतने क्लिष्ट होते हैं कि आम जन क्या, ख़ास पढ़े-लिखे लोगों को भी समझने में परेशानी होती है.
पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी अपनी भाषणों में अच्छी हिंदी का प्रयोग करते थे. उन्होंने विदेशों में और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हिंदी में बोलकर हिंदी का मान बढ़ाया था. वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस हिंदी को और विस्तार दिया. वे अधिकांश विदेश यात्राओं में हिंदी का प्रयोग करते रहे हैं. हाँ उनकी हिंदी में यह खासियत है कि वे सीधे-सादे बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों को इस तरह मिला देते हैं जैसे वह हिंदी के ही शब्द हों. वे अंग्रेजी के कई शब्दों का विस्तार भी हिंदी अंग्रेजी में करके लोगों को चमत्कृत कर देते हैं. जैसे फेसबुक के संस्थापक जुकरबर्ग के सामने JAM का विस्तार बताते हुए कहते हैं. J – से जन-धन खाता, A – से आधार नम्बर और M – से मोबाइल … यानी इन तीनों को अगर एक साथ जोड़ दिया जाय तो एक व्यक्ति की पहचान बन जाती है और यह पहचान भारत के आर्थिक मामले में बहुत बड़ा रोल अदा कर सकता है. उन्होंने और भी बहुत जगह हिंदी अंग्रेजी को मिक्स्ड किया है. इससे हिंदी की गरिमा कम नहीं हुई बल्कि उसकी स्वीकार्यता बढ़ी है.
पुराने कवियों में अगर तुलसीदास को लें तो उन्होंने हिंदी, संस्कृत और अवधी भाषा को मिलाकर रामचरितमानस की रचना की और भी कई धार्मिक काव्य ग्रन्थ लिखे, जिनमे सरल हिंदी का प्रयोग किया गया. इससे यह ज्यादा लोकप्रिय और सर्वग्राह्य बने. रहीम, कबीर, सूरदास, भारतेंदु हरिश्चंद्र, दिनकर, नागार्जुन, दुष्यंत कुमार, हरिवंश राय बच्चन आदि इसीलिये ज्यादा लोकप्रिय और सर्वग्राह्य बने क्योंकि उन्होंने सरल हिंदी में अपनी काव्य रचनाएँ की. गद्य रचना में कहानीकार प्रेमचंद, व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई, गद्यकार हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, सरदार पूरण सिंह, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवती चन्द्र वर्मा, गुरुदत्त, आदि ने हिंदी को आम जन तक पहुँचाया. आज के युग में देखें तो कुमार बिश्वास अपनी कविताओं को सरल शब्दों में, सस्वर पाठ कर देश-विदेश में हिंदी का मान-सम्मान बढ़ा रहे हैं. और भी बहुत सारे कवि जो या तो छंद-बद्ध या छंद-मुक्त कविता लिखकर लिखकर भी अपनी बात जन-जन तक पहुँचाने में सफल हुए हैं. इसी तरह आज हिंदी की पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाओं, का संपादन न केवल भारत में बल्कि विदशों में भी धरल्ले से हो रहा है.
हिंदी को जन-जन तक पहुँचाने में भारतीय फिल्म उद्योग का भी बड़ा योगदान है. विभिन्न फिल्म के गाने और संवाद काफी लोकप्रिय हुए और आमजन तक पहुँचे. उसके साथ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो, दूरदर्शन, टेलीविज़न आदि के साथ-साथ अब सोसल मीडिया भी हिंदी के विकास में अहम रोल अदा कर रहा है. ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर आदि में हिन्दीकरण से बहुत ही फायदा हुआ है और काफी लोग हिंदी में लिखने लगे हैं और इस तरह हिंदी जन-जन तक पहुँच रही है.
अंत में मेरा सार यही है कि हिंदी को जितना सरल और सर्वग्राह्य बनायेंगे हिंदी को उतना ही प्रचार प्रसार कर पायेंगे. हिंदी में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ साथ अंग्रेजी, उर्दू, और अन्य आंचलिक भाषा के शब्दों को मान्यता देनी होगी. हाँ व्याकरण हिंदी का होगा, वर्तनी हिंदी की होगी और शुद्धता का ख्याल रक्खा जायेगा तभी हिंदी समृद्ध और विक्सित होगी. तब शायद हमें साल में एक दिन हिंदी दिवश मानाने की आवश्यकता भी महसूस न होगी. हर दिन हिन्दी होगा और हम अधिक से अधिक हिंदी बोल पाएंगे, लिख पाएंगे, अपनी बातें विभिन्न संचार माध्यमों से दूसरों तक पहुंचा पाएंगे.
भारत के माथे की बिंदी बन कर हिंदी भारत माँ के सौभाग्य की शोभा बढ़ती रहे!
सरल हिंदी के प्रयोग के कुछ उदाहरण मैं भी प्रस्तुत कर रहा हूँ. दोहों के रूप में
हिंदी गौरव देखिए, हुई गालियाँ शिष्ट।
आप खाप खंग्रेसिए, कहते लोग विशिष्ट ।
कैसा सुन्दर रूप है, कहते सारे भक्त ।
पीड़ा से मत रोइए, पीड़ित दलित निशक्त ।
पानी पानी हो रही, दो सरकारें आज ।
पानी के इस जंग मे, ठप्प पड़े सब काज।
गोरक्षक बन राखिये, गोमाता की लाज.
गोमाता की आड़ में, करिए कुत्सित काज!
कंधे मांझी ढो रहा, मृत पत्नी का लाश
गाँव गरीबों का यहाँ, कैसे रक्खें आश
कोई पानी डूबता, कोई खींचे चित्र
डूबत को दे हाथ तू, बन जाओ तुम मित्र.
जय हिंदी! जय हिन्द!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
September 18, 2016

श्री जवाहर जी हिंदी सदैव दिल के समीप रहती हैं एक बार ईरान के बड़े शहर में गए एक पाकिस्तानी हमें देख कर रुक गया उसने कहा प्लीज आप मेरे से हमारी अपनी मादरे वतन की भाषा में बात करो मैं मर जाऊँगा जब से आया हूँ अपनी जुबान सुनने को तरस गया हूँ अपनी भाषा में बात करने के लिए काफी देर तक अपने दुःख दर्द बांटता रहा अंत में लम्बी सांस ले कर कहा परदेस में अपना हम जुबान मिल जाएँ मन को कैसा सकूँन मिला हिंदी और उर्दू बोलने में लगभग एक सी ही हैं परदेस मैं पता चलता है

    jlsingh के द्वारा
    September 19, 2016

    आदरणीया शोभा जी, मैं भी एक बार कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग के लिए जर्मनी गया था. वहां कुछ पाकिस्तानी लोगों से भेंट हुई थी, वे देखते ही हिंदी में हमसे बात करने लगे. एक सरदार जी का होटल था. वे भी हिंदी में बात करते रहे और हमलोगों से मिलकर खुश हुए. विदेशों में जब भी कोई अपने देश या पड़ोसी देश का मिल जाता है खुशी होती है. वैसे जर्मन बड़े शिष्ट होते हैं और भारतीयों का स्वागत करते हैं. आपकी अपनी स्मृति साझा करने के लिए आभार!

rameshagarwal के द्वारा
September 17, 2016

जय श्री राम आदरणीय जवाहर जी हिंदी के बारे में बहुत अच्छा लेख अंग्रजो के जाने के इतने साल बाद भी अंग्रेज़ी प्रेम कम नहीं हुआ हिन्दी में बोलना अब भी हीन भावना से देखा जाता इस परिस्तिथि के लिए अंग्रेज़ी स्कूल और हंम लोगो की मानसिकता है जो बच्चो के अंग्रेज़ी बोलने पर खुश होते और आधुनिकता का लेबल लगाते.आज यदि हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं बन पाई इसके लिए हिंदी बोलने वाले प्रदेश ज्यादा ज़िम्मेदार है अभी तक सर्वोच्च न्यायालय में हिंदी में काम नहीं होता.वैसे जागरण इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रहा,सुन्दर लेख के लिए बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    September 19, 2016

    आदरणीय अग्रवाल साहब, न्यायलय में हिंदी का इस्तेमाल हो इस पर मैंने पहले भी लिखा है कुछ पंक्तियाँ उद्धृत है बीता हिन्दी दिवस भी, मना लिए सब जश्न! न्याय लेख भी हो हिंदी, कौन करेगा प्रश्न! 2.नियम सरलता से बने, सब कुछ हो स्पष्ट तर्क कुतर्क न बन जाय, बने वकील न भ्रष्ट. अब तो हमारे नीति निर्धारक ही बता सकते हैं की कब होगा यह सब? आपके प्रतिक्रिया का आभार!

Jitendra Mathur के द्वारा
September 17, 2016

आलेख के मूल विचार तथा भावना से मैं पूरी तरह सहमत हूँ आदरणीय जवाहर जी । हिन्दी के सम्मान तथा उन्नयन के निमित्त इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है ।

    jlsingh के द्वारा
    September 17, 2016

    मेरे विचार से सहमति जताने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय जितेंद्र माथुर जी!


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