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रेल गाड़ी है गजब सवारी!

Posted On: 28 Feb, 2017 मस्ती मालगाड़ी में

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रेलगाड़ी अपनी खिड़की से, नूतन दृश्य दिखाती,
कहीं पहाड़, कहीं पर जंगल, आस पास दिखलाती.
अचल अटल पर्वत हैं कैसे, जंगल सुरभित होते..
अगर पहाड़ न होते, तो ये जंगल कहाँ से होते
जंगल अगर न होते, तो फिर बारिश कहाँ से होती
बारिश अगर न होती, तो ये नदियां कहाँ से होती.
नदियों का जल सिंचित करता, खेत, बाग़ सस्यों का.
नदियों संग ही जन्मी सभ्यता, सिंधु, द्रविड़, आर्यों का,
शस्य पूर्ण धरती को करता, जलधारा अमृत सा,
महिषी गायें जीवन देतीं, दूध पिला निज थन का.
ईख, धान, सब्जी के पौधे, मन को कहीं लुभाते,
बाग़ बगीचे, आम्र, कदली के, फल को वही चखाते
शीशम के ये पेड़ खड़े हो, शक्ति अपनी दिखलाते,
शाल संग ये सागवान भी, वन सम्पदा कहाते..
नदी चौड़ी पर पुल से होकर, रेल गाड़ी जब चलती,
घर्षण,स्पंदन का स्वर, संगीत कर्ण में भरती.
रेल गाड़ी है गजब सवारी,,लोहे के पथ चलती,
अपने अंदर शत शत जन को, संग उमंग से भरती..
भारत देश की जीवन रेखा, रेलगाड़ी कहलाती,
भारत के ही प्रांतों का, यह सैर सदा ही कराती.
रेलगाड़ी की छुक-छुक छुक-छुक जीवन की गाथा है,
एक साथ ही शत शत जन को प्रेम से मिलवाता है.

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 13, 2017

आदरणीय सिंह साहब ! सादर हरिस्मरण और सुप्रभात ! बहुत अच्छी कविता ! रेलगाड़ी में सैर करना मुझे भी बहुत भाता है ! बचपन में भीड़ भरे डिब्बे भी भाते थे, किन्तु अब यात्रा तभी हो पाती है जब रिजर्वेशन कन्फर्म हो ! आपको और आपके परिवार को होली की बहुत बहुत बधाई ! तकनीकि समस्या के चलते मंच पर पढ़ना लिखना दुश्वार हो गया था ! आधी स्क्रीन ढकी रहती थी ! बहुत शिकायत करने पर उन्होंने इसे ठीक किया है ! विज्ञापनों के कारण अभी भी तकनीकि समस्या है ! अक्षर बड़े करने पर लिखने पढ़ने और कमेंट करने में बड़ी दिक्कत है ! सादर आभार !

    jlsingh के द्वारा
    March 19, 2017

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप मंच पर बहुत सक्रिय रहते हैं इसमें कोई दो राय नहीं है पर जागरण की तकनीकी समस्या बहुतों को यहाँ से दूर ले जा रही है. फिर भी हम सब जुड़े हैं और जुड़े रहेंगे. यहाँ कुछ लेखकों से आत्मीय सम्बन्ध सा हो जाता है … उम्मीद है जागरण ध्यान देगा. आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार!

yatindrapandey के द्वारा
March 11, 2017

छोटी छोटी पंक्तियों में बड़ी गहरी बात कह दी सर बेहतरीन लेखनी के लिए अभिनन्दन यहाँ कुछ ही लोग बेहद अच्छा लिख रहे है कुछ बहुत ज्यादा लिख रहे है पर उन्हें पढ़ने मे वो रस नहीं मिल पा रहा उसपर से JJ की वेबसाइट भी हैवी कर दी है बहुत लोगो को पढ़ने में भी दिक्कत है पर आप अभी सब पर भारी दिखते है | यतीन्द्र

    jlsingh के द्वारा
    March 12, 2017

    आदरणीय यतीन्द्र पांडेय जी, आपकी मनभावन प्रतिक्रिया से मन खुश हो गया! अब जागरण जंक्शन पर पहले जैसा माहौल नहीं रहा. लिखनेवाले ही ज्यादा हैं एक दुसरे का पढ़कर रसास्वादन और सुधारात्मक प्रतिक्रिया वाले सुधीजन नहीं रहे. राजनीतिक विषयों में उलझकर हम सभी रह गए हैं. जागरण जंक्शन भी लेखकों/ब्लॉगरों की पहचान करने और उन्हें सम्मानित करने में अब ज्यादा रूचि नही ले रहा. प्रतियोगिताएं आयोजित नहीं होती. विज्ञापनों की भरमार है. तकनीकी दिक्कत से यह मंच हमेशा घिरा रहता है कभी प्रतिक्रिया पोस्ट नही होती तो अधिकांश के लैपटॉप या मोबाइल पर यह साइट नहीं खुलता फिर भी हमारे जैसे पुराने कुछ ही लोग बचे हैं और नियमित लिखा भी रहे हैं वासे मैं भी फेसबुक पर ही ज्यादा समय ब्यतीत करने लगा हूँ. वहां भी अच्छी अच्छी रचनाएँ पढने को मिल जाती हैं. आपका बहुत बहुत आभार!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 9, 2017

रेलगाड़ी की छुक-छुक छुक-छुक जीवन की गाथा है,……………………वाह, बहुत सुंदर ।

    jlsingh के द्वारा
    March 10, 2017

    बहुत बहुत आभार आदरणीय बिष्ट साहब!

Shobha के द्वारा
March 3, 2017

श्री जवाहर जी सुंदर कविता रेलगाड़ी में सफर का आनन्द ही अलग है रेलगाड़ी की छुक-छुक छुक-छुक जीवन की गाथा है, एक साथ ही शत शत जन को प्रेम से मिलवाता है.बचपन में खिड़की पर बैठने की जिद होती थी

    jlsingh के द्वारा
    March 10, 2017

    सकारात्मक और सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी!


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