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आस्था के महापर्व का समापन

Posted On: 29 Oct, 2017 Religious में

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अस्ताचल गामी भगवान भास्कर की अंतिम किरण प्रत्यूषा और उदीयमान सूर्य की प्रथम किरण ऊषा (पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य भगवान की पत्नियाँ) को अर्घ्य देने के साथ ही लोक आस्था का महापर्व संपन्न हो गया. भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए गुरुवार की शाम से ही घाटों पर श्रद्धालु जमे रहे. बिहार-झारखंड, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई सहित पूरे देश में घाट पर छठ पूजा के तीसरे दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे.


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आस्था का महापर्व छठ बिहार समेत देश के कई राज्यों में मनाया गया. यह पर्व मंगलवार (चतुर्थी) को नहाए-खाए के साथ शुरू होता है और बुधवार (पंचमी) को पूरे दिन उपवास के साथ शाम को खीर और दोस्ती-रोटी का खरना किया जाता है. कहीं-कहीं पर लोग साथ में केला भी खा लेते हैं. गुरुवार को अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य को अर्घ्य दिया गया, जबकि शुक्रवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन हुआ.


इस त्योहार में श्रद्धालु तीसरे दिन डूबते सूर्य को और चौथे व अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्ध्य देते हैं। पहले दिन को ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है जिसमें व्रती लोग स्नान के बाद लौकी की सब्जी, चने की दाल के साथ अरवा चावल का भात सिर्फ एक बार खाते हैं. सब्जी और दाल में सेंधा नमक का प्रयोग होता है. मसाले नहीं डाले जाते. दूसरे दिन को ‘खरना’ कहा जाता है, जब श्रद्धालु दिन भर उपवास रखते हैं, जो सूर्य अस्त होने के साथ ही समाप्त हो जाता है. उसके बाद वे मिट्टी के बने चूल्हे पर गुड़ और दूध के ‘खीर’ और रोटी बनाते है, व्रती पहले खा लेते/लेती हैं. बाद में इसे प्रसाद के तौर पर वितरित किया जाता है. आस पास के लोगों/सम्बन्धियों को घर बुलाकर प्रसाद ग्रहण कराया जाता है.


पर्व के तीसरे दिन छठ व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देते हैं. चौथे व अंतिम दिन को पारन कहा जाता है. इस दिन व्रती सूप में ठेकुआ, सठौरा जैसे कई पारंपरिक पकवानों के साथ ही केला, गन्ना, एवं मौसमी फल सहित विभिन्न प्रकार के फल-फूल रखकर उगते सूर्य को अर्ध्य देते हैं जिसके बाद इस पर्व का समापन हो जाता है. पारन में अधिकांश लोग पहले अदरख और गुड़ खाते हैं, गुड़ का शरबत पीते हैं उसके बाद केला आदि फल और ठेकुआ का प्रसाद ग्रहण करते हैं.


आस्था और श्रद्धा का यह पर्व पहले तो अविभाजित बिहार का ही मूल पर्व कहा जाता था. अब यह बिहार, झाड़खंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है साथ ही इस क्षेत्र के लोग देश-विदेश में जहाँ भी हैं श्रद्धा पूर्वक मनाते हैं. अगर मूल रूप से देखा जाय तो यह प्राचीन भारत के मूलवासी या कहें भारतीय किसान का पर्व है. इसमें सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश की पूजा एक साथ होती है.


इनके द्वारा जो भी पृथ्वी पर उत्पन्न होता है वह सभी वस्तुएं प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती हैं. साथ ही इसमें समाज के हरएक वर्ग की सहभागिता भी होती है. जो खुद व्रत नहीं कर पाते वे किसी न किसी रूप में सहयोग करते हैं. कोई घाट की सफाई कर देता है. कोई सड़क रास्ते की सफाई कर देता है. कोई प्रकाश की ही व्‍यवस्था कर देता है तो कोई फल, फूल, धूप, अगरबत्ती या अन्य पूजन सामग्री देकर ही मदद कर देता है.


परिवार या समाज के लोग इसके माध्यम से एक सूत्र में बंधे दिखते हैं. पिछले कुछ सालों से दृश्य मीडिया के द्वारा लाइव प्रसारण पर खूब जोड़ दिया जाता रहा है और देश विदेश के हर स्थानों को लाइव दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है. इससे इस महापर्व की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है.


लोकप्रियता बढ़ने से कुछ विवाद होना स्वाभाविक सा हो जाता है. पटना के अलावा मुंबई, दिल्ली, जमशेदपुर, रांची और गुजरात में भी इस बार इस पर्व को प्रमुखता से किया गया और दिखाया भी गया जिसमें सियासी लोगों की भागीदारी भी देखने को मिली. मुंबई में इस बार भी यह उत्सव कांग्रेस और भाजपा के बीच यह लाग-डाट का माध्यम बनने से नहीं बच पाया. पिछले दो वर्ष से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस स्वयं जुहू पधारकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते नजर आते हैं.


मुंबई महानगर का जुहू स्थित समुद्री तट छठ पूजा की शाम सागर में डूबते लाल-लाल सूर्य और उन्हें अर्घ्य देते छठ व्रतियों से गुलजार हो जाता है. मुंबई में पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोगों की आबादी करीब 40 लाख है. इनमें से छठ पूजा करने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. छठ व्रती महिलाओं के साथ-साथ उनके परिवारों के पुरुष सिर पर अथवा सामूहिक रूप से छोटे टैम्पो में पूजा का सामान लेकर समुद्र तट की ओर जाते दिखाई दे रहे थे. शाम होने तक एक तरफ अरब सागर होता है, तो दूसरी तरफ उसके किनारे ही जनसागर. जो शाम का अर्घ्य देकर रात भर जुहू तट पर ही रुकता है. अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर ही अपने घर लौटता है.


हिंदीभाषियों की इतनी बड़ी आबादी महानगर के राजनीतिक दलों को भी लुभाती रही है. इनके बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कर राजनीतिक दल अपनी सियासत चमकाते रहे हैं. करीब तीन दशक पहले उस समय के जनसंघ के कार्यकर्ता मोहन मिश्र ने छठव्रती महिलाओं को वस्त्र बदलने सहित कुछ और सुविधाएं देने के लिए छठ उत्सव महासंघ का गठन किया था। यह महासंघ करीब दो दशक तक चुपचाप अपना काम करता रहा.


2008 में लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव से पहले अचानक कई राजनीतिक दलों ने जुहू बीच पर अपने-अपने मंच सजाकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन शुरू कर दिया. जिसके जवाब में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने छठ पूजा को हिंदीभाषियों के शक्तिप्रदर्शन का माध्यम न बनाने की चेतावनी दी थी. राज ठाकरे की उक्त चेतावनी के बाद से ही मुंबई में छठ पूजा सियासत का भी जरिया बन गई है.


कांग्रेस के वर्तमान मुंबई अध्यक्ष संजय निरुपम जब शिवसेना के राज्यसभा सदस्य थे, तो वह शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को भी छठपूजा में लाए थे. इसी प्रकार मुंबई भाजपा के महासचिव अमरजीत मिश्र पिछले दो वर्षों से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस को जुहू की छठपूजा में लाकर उनसे सूर्यदेव को अर्घ्य दिलवा रहे थे. मुंबई के हिंदीभाषी मतदाताओं पर मुख्यतया इन्हीं दोनों दलों का दावा रहता है. इसलिए सियासत भी इन्हीं दोनों दलों की चमकती है.


दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी से लेकर, कांग्रेस और भाजपा भी अपना सियासत दाव खेलती नजर आयी. गुजरात जहाँ दिसंबर में चुनाव होने हैं वहां भी राजनीतिक दल इसमें सक्रिय रहे. पटना में लालू यादव के घर का छठ प्रसिद्ध है तो रामविलास पासवान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहाँ पीछे रहने वाले हैं. सभी ने अपने अपने स्तर पर छठ मनाया और सियासत बयानबाजी से बचते रहे.


छठ को लेकर पटना से लेकर पूरे राज्य में सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए गए थे. गंगा के तटों से लेकर जलाशयों के घाटों पर अभूतपूर्व सुरक्षा के इंतजाम देखे गए. पटना जिला प्रशासन की ओर से गंगा तट पर 101 घाटों पर तथा शहर में 45 तालाबों पर छठव्रतियों को भगवान भास्कर के अर्घ्य देने के इंतजाम किए गए थे.


जमशेदपुर स्थित सिदगोरा में वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास के ही पहल पर भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण कराया गया और उसके आसपास के क्षेत्र को विकसित कर पर्यटन स्थल जैसा बना दिया गया है. दो पक्के तालाब जिसमे ताजा और साफ़ जल भरा जाता है, छठ व्रती इकठ्ठा होते हैं और आस्था के साथ भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करते हैं. षष्टी के दिन अर्घ्य कार्यक्रम के बाद रात्रि में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाता है.


पहले तो लोक गायिकाओं को बुलाया जाता था जो छठ गीत और भजन ही गाती थी. पर पिछले साल से फ़िल्मी गायिकाओं और स्टेज परफ़ॉर्मर को बुलाया जाने लगा है जो फ़िल्मी गीतों को स्टेज पर गाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं साथ ही कुछ विवाद पैदा करने का माध्यम बन जाते हैं. इसके गवाह में मुख्यमंत्री यहाँ अपनी मौजूदगी जरूर दिखाते हैं.


इस बार एक और विवाद जो उभर कर आया वह है महिलाओं द्वारा सिन्दूर करने का. छठ व्रत में महिलाएं नाक से लेकर भर मांग सिन्दूर करती हैं. यहाँ हम बताते चले कि नाक से मस्तक तक का सिन्दूर मायके पक्ष के लिए और पूरे मांग का सिन्दूर ससुराल के पक्ष को दर्शाता है. यानी दो परिवारों के मिलन का प्रतीक.


इसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने दासता का प्रतीक बता दिया. धन्य है तथाकथित बुद्धिजीवी और उनकी स्वतंत्र सोच. हमारी भारत भूमि परंपरा और संस्कृति से बंधी है इसे एकदम से समाप्त नहीं किया जाना चाहिए. किसी की आस्था और परम्परा पर प्रश्न करना जब तक कि वह किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हों वाजिब नहीं है, मेरी समझ से. भारत देश महान है!

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