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श्री आनंद बिहारी

Posted On: 27 Nov, 2017 में

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एक हैं हमारे मित्र, नाम है, आनंद बिहारी
बड़े ही मृदुभाषी अल्पहारी
अपना टिफिन अवश्य लाते हैं
पर खाना भूल जाते हैं
घर जाते समय सहकर्मियों को करेंगे अनुरोध
खा लीजिये आप भी, नहीं तो घर में पत्नी करेगी प्रतिरोध
कार रक्खें हैं, पर स्वयं नहीं चलाते हैं
गांव जाते समय, ड्राइवर को ले जाते हैं
कल जा रहे थे पार्टी में एक मित्र की गाड़ी से
बड़े खुश थे पर बीच बीच में कह रहे थे
आराम से चलाइये… ४० के स्पीड में भी घबरा रहे थे.
पार्टी में खाने में भी शर्मा रहे थे
पर पीने में उनका जवाब नहीं
शराब में पानी मिलाने पर चिल्ला रहे थे.
एक तो यह है ही बड़ा हल्का
ऊपर से पानी का तड़का
खाने के बाद बोले
अगर आपकी इजाजत हो तो थोड़ा कोल्ड ड्रिंक ले लें!
हमने कहा – आराम से लीजिये
जितनी इच्छा हो पी लीजिये
वे पीते रहे और मुंह बिचकाते रहे
कुछ पता ही नहीं चल रहा
ऐसा लगता है सिर्फ मिनरल वाटर ही पी रहे हैं
एक दो तीन गिलास
नजरें कर रही थी कुछ और ही तलाश
हमने कहा – अब चलिए
उन्होंने कहा – थोड़ा ठहरिये
आखिर चलने को हुए तैयार
फिर गाड़ी में हुए सवार!
अब रास्ता था बिलकुल खाली
गाड़ी के ड्राइवर ने भी तो थोड़ी चढ़ा ली!
अब गाड़ी चल रही थी १०० की रफ़्तार से,
सड़के किनारे के पेड़ भाग रहे थे कतार से.
आनद बिहारी साहब अब मस्ती में झूम रहे थे
ड्राइवर को गाड़ी और तेज चलाने को घूर रहे थे.
क्या यार रिक्शा चलाता है क्या?
तेज चलाने से डरता है क्या?
कुछ मालूम है, टाइम कितना हुआ है?
घर पहुंचने के बाद बोले – बड़ा सुस्त ड्राइवर है तू
ये लो पचास रुपये, रख ले तू
इतना ही खुदड़ा है अभी
बाद में ले लेना कभी!
तो अब आप समझ गए होंगे
शराब क्या चीज होती है
पीने के बाद, आदमी के सर चढ़कर बोलती है!
कोई कहता है – पीने के बाद, हो जाता है स्वर्ग का दर्शन!
जो पीता नहीं वह क्या जाने होती क्या चीज तड़पन …
(एक अनुभव के आधार पर)

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashi bhushan के द्वारा
December 7, 2017

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! “जिसने नहीं चखी जीवन में, वो क्या जाने मय का मजा !” एक भिखारी रोज मंदिर के सामने सुबह से शाम तक भीख माँगता, तब जाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता था ! एक दिन उसका एक भिखारी मित्र आया और भीख मांगने के लिए उसे लेकर देसी दारु की भट्टी पर चला गया ! भट्टी में जाते समय तो किसी ने उसे कुछ भी नहीं दिया, किन्तु निकलते समय ज्योही उसपर दृष्टि पड़ती लोग झूमते हुए अपनी जेब में हाथ डालते और जो भी नोट या सिक्का मिल जाता मुट्ठी भरकर उसके कटोरे में दाल देते और झूमते हुए बढ़ जाते ! कुछ ही देर में उसका कटोरा नोटों से भर गया ! भिखारी प्रसन्नता के आवेग में अपने दोनों हाथ उठाकर उपरवाले को सम्बोधित करते हुए बोला- “धन्य हैं प्रभु ! रहते हैं यहाँ पर और पता बताते हैं मंदिर का !” तो ये है “मय” कि माया !

    jlsingh के द्वारा
    December 9, 2017

    आदरणीय शशि भूषण जी, सादर प्रणाम! काफी दिनों बाद आपके दर्शन हु इस मंच पर …. आते ही चमत्कार कर गए! आपका जवाब नहीं. सादर!

harirawat के द्वारा
November 29, 2017

वह भतीजे जवाहरलाल सिंह जबाब नहीं, पीते हम हैं फौजी हैं न और उसकी रंगत हमारा भतीजा लेता है ! बिलकुल सही दर्शन करा दिए तुमने ड्रिंक के कोल्ड बताकर हवा में उड़ने वाले ड्रिंककी ! पता नहीं ये आइडिया तुम्हे आया कहाँ से बेचारे आनंद बिहारी को बीच में घसीट लिया ! शराबियों को मार्ग दर्शन की अच्छी रचना है, आशीर्वाद !

    jlsingh के द्वारा
    December 1, 2017

    आदरणीय चाचा जी, सादर प्रणाम. भतीजा हूँ आपका … आजकल पार्टियों में होता क्या है? बिना ड्रिंक और चखना के पार्टी भी होती है भला. मैं तो कोल्ड ड्रिंक/ सॉफ्ट ड्रिंक ही लेता हूँ. पर अपने मित्रों को ही देखता हूँ जो अभ्यस्त नहीं है शराब के पर पार्टियों में जनेऊ तोड़ देते हैं और यदा कड़ा बहक भी जाते हैं. मैंने कई बार अपने मितों को सम्हाला है और उनके घर तक सही सलामत पहुँचाया है. सादर!

Shobha के द्वारा
November 28, 2017

श्री जवाहर जी आप कवि भी हैं सरल भाषा के कवि आपको सादर प्रणाम कविता के भाव मेंरे सिर से ऊपर गुजरते रहे हैं मुझे आखिल भारतीय साहित्य परिषद जबलपुर जाने का अवसर मिला क्या बताऊँ १२० कवियों की कविताएँ मैं सुनसुन कर मरते-मरते बची सुनना भी जरूरी था गले में माला डाल कर आगे बिठा दिया गया था महिलाएं तो रो-रो कर ऐसी आवाजें निकाल कर कविताएँ कर रहीं थी जैसे दुखों का पहाड़ उन पर टूट पड़ा हो |नारी सशक्तिकरण का युग है वहाँ एक कवि मैं चाय पी रही थी उन्होंने मुझसे पूछा आपको मेरी कविता कैसी लगी मैने शिष्टाचार वश कहा अच्छी थी उन्होने कहा इसके ९० छन्द हैं जोश में सुनाने लगे मैं वहाँ से खसक गयी आपकी कविता आसान है आप बुरा नहीं मानियेगा मेरी एक बहन भी कवि है मैं उसकी कविताएँ सुन कर परलोक सिधारूंगी

    jlsingh के द्वारा
    December 1, 2017

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, मैं मूलत: लेखक ही हूँ. यदा कड़ा तुकबंदी कर लेता हूँ और सरल शब्दों में ही कभी व्यंग्य के लिए तो कभी भाव प्रकट करने के लिए. आपने भी अच्छा कटाक्ष कर दिया कवियों पर आजकल बड़े थोक भाव में कवि हो गए हैं और साहित्यिक पुस्तकें १५० रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध है. फेसबुक पर तो बिलकुल मुफ्त! तुकबंदी पढ़ने और उसपर प्रतिक्रिया देने के लिए आभार!


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